छत्तीसगढ़

अपह्रत जवान संतोष कट्टम को जन अदालत में पत्नी और बेटी के सामने मिली रिहाई

प्रभात सिंह @ दंतेवाड़ा

छत्तीसगढ़ के  बीजापुर जिले का अधिकाँश ईलाका माओवादियों के अघोषित जनताना सरकार राज के हिस्से में आता है. जहाँ एक आरक्षक संतोष कट्टम को माओवादियों ने अगवा कर लिया था लेकिन करीब एक सप्ताह पूर्व 06 मई को यह खबर सोशल मीडिया व्हाट्सएप के माध्यम से सामने आई थी कि आरक्षक संतोष घर से राशन लेने बीजापुर में ही अटल आवास गये हुए थे. उनके पास लाल रंग की स्कूटी थी, जिससे वह घर से निकले थे. लेकिन आरक्षक संतोष के घर वापस आने के बाद स्थिति साफ़ हो पाई है कि दरअसल बीजापुर पुलिस के जवान संतोष कट्टम को माओवादियों ने अगवा कर लिया था. संतोष कट्टम के सकुशल वापसी की पुष्टि बीजापुर के पुलिस अधीक्षक कमलोचन कश्यप ने की है. एसपी ने कहा कि वह ड्यूटी से अक्सर बिना बताए गायब रहता था.

सोशल मीडिया व्हाट्स एप पर गुमशुदगी का सन्देश

हमने इस सम्बन्ध में संतोष कट्टम से बात कि तो उन्होंने बताया कि उसकी पोस्टिंग भोपालपट्टनम थाने में है. वह होली के त्यौहार की छुट्टियों में भोपालपट्टनम से घर अपने परिवार के पास सरकारी मकान में बीजापुर आया था. परिवार की पूरी जिम्मेदारी उस पर ही है. पिता के देहांत के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों की पूर्ति हेतु उसे कई बार नौकरी से गैरहाजिर भी रहना पड़ता था. संतोष के पिता का पुलिस लाइन कारली में 16 मार्च 2003 को मेले के दिन सड़क दुर्घटना में मृत्यु होने के बाद उसकी ड्यूटी प्रभावित होने लगी थी.

आरक्षक संतोष कट्टम स्थानीय दोरला जाति से आते है. इनका मूल निवास जगरगुंडा के पास कामाराम नामक गाँव में है. पुलिस और माओवादियों के संघर्ष वाले इस इलाके में सलवा जुडूम के बाद काफी पलायन हुआ जो अब जाकर रुका है गाँव के ज्यादातर लोग अब गाँव वापस आ रहे हैं.

घटना दिनांक 05 मई 2020 की है उस दिन आरक्षक संतोष अपने एक परिचित बीजापुर के किराना व्यावसायी के साथ गोरना मेला में देवी और देवताओं को प्रसन्न करने मन्नत स्वरुप नारियल चढाने गये थे.

यही छत्तीसगढ़ पुलिस के जवान संतोष से बहुत बड़ी चुक हो गई, संतोष के मुताबिक माओवादियों के किसी मुखबिर ने माओवादियों को उसके मेले में आने की सुचना दे दी. जिसके बाद उसे माओवादियों ने पकड़ लिया फिर उनके द्वारा संतोष के स्कूटी के डिक्की की तलाशी ली गई जिसमें से माओवादियों ने पहचान पत्र, पुलिस विभाग की सरकारी टीशर्ट, इलेक्ट्रिकल्स के औजार, राशनकार्ड और उसके हाथ से मोबाइल ले लिया. माओवादियों के गुट ने उसके हाथ बांध दिए और गोरना से पैदल ही लेकर जंगल की ओर चले गये. उसके साथ 05 माओवादी थे. इतना सब होने के बाद भी अरबों खर्च कर तैयार किया गया पुलिस का सुचना तंत्र नाकारा साबित हुआ.

संतोष कट्टम से माओवादियों ने स्पष्ट कहा कि तुम कौन हो और क्या करते हो सब सच सच बताओ तभी तुम बच पाओगे. बिना डरे आरक्षक संतोष ने जो भी उसके बारे में निजी जानकारी थी माओवादियों को सच सच ही बता दिया. संतोष कट्टम ने माओवादियों को बताया कि वह स्थानीय नागरिक है भोपालपट्टनम थाने में पदस्थ है वह जगरगुंडा इलाके का रहने वाला है और पुलिस विभाग में इलेक्ट्रिकल्स मैकेनिक का काम करता है. माओवादियों द्वारा पूछताछ में उसने उन्हें बताया कि थाने में ड्यूटी के दौरान उसे सुरक्षा के लिए राइफल भी मिलता है.  

संतोष के घर में पत्नी सुनीता कट्टम के साथ उसके तीन बच्चे रहते हैं, जिनमें चंचल 11 वीं, भावना 10वीं एवं तरुण कक्षा 01 का छात्र है. माओवादियों द्वारा संतोष के अपहरण के बाद उसकी पत्नी सुनीता कट्टम ने कहीं से सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी का नंबर लेकर उन्हें फोन किया और उनसे मदद की गुहार लगाईं. सोनी सोरी ने इस कोरोना वैश्विक आपदा के दौर में दंतेवाड़ा कलेक्ट्रोरेट जाकर बीजापुर जाने-आने हेतु पास का आवेदन दिया. ताकि बीजापुर जाकर संतोष को खोजने और उनके परिवार को मदद देने की कोशिश की जा सके.

लेकिन जिला प्रशासन दंतेवाड़ा को यह शायद मंजूर नहीं था. जिला प्रशासन ने उनको अब तक कोई भी पास जारी नहीं किया हैबीजापुर जाने कि एक बार सोनी सोढ़ी ने कोशिश कि थी लेकिन उन्हें भैरमगढ़ के पहले पड़ने वाले थाने में रोक दिया गया और उनके द्वारा आरक्षक के परिवार को मदद पहुंचाने का हवाला दिए जाने के बाद भी उन्हें बीजापुर जिला मुख्यालय तक भी जाने नहीं दिया गया. जिसके कारण सोनी सोढ़ी आरक्षक संतोष कट्टम के परिवार तक कोई मदद नहीं पहुँचा पाई हैं.

इसी बीच बीजापुर की महिला पत्रकार पुष्पा रोकड़े ने अपने कुछ पत्रकार साथियों के साथ लगातार दो तीन दिन जंगल में जाकर अपने सूत्रों से आरक्षक के नक्सलियों के कब्जे में होने की सुचना प्राप्त करने की कोशिश की लेकिन वो कामयाब नहीं हो सकीं.

अपह्रत आरक्षक संतोष कि मानें तो सोनी सोरी को सुचना देने से पहले उनकी पत्नी ने बीजापुर पुलिस को सुचना दी थी. लेकिन वहां से कोई भी मदद मिलता नहीं देख आरक्षक के परिवार वालों ने सोनी सोरी से मदद की गुहार लगाईं.

आपको बीजापुर के पुलिस कि कार्यप्रणाली पर शक करने के लिए बस इतना समझना काफी है कि नक्सलियों द्वारा अपहरण किये गये जवान की सुचना को साधारण गुमशुदगी दर्ज किया गया और उसके सकुशल रिहाई के लिए कोई कारगर कदम उठाने का काम पुलिस की बजाय स्थानीय पत्रकारों ने किया.

नक्सलियों के कब्जे में करीब एक सप्ताह रहने के दौरान बीजापुर के पुलिस जवान संतोष ने बताया कि नक्सलियों ने उसके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया. गाँधी के इस देश में सच बोलने का परिणाम उसे माओवादियों द्वारा अच्छा व्यवहार के रूप में मिला. उसने बताया कि उसके साथ माओवादियों ने कोई मारपीट नहीं की है. हमने संतोष से जानना चाहा कि आपको वहाँ खाने में क्या क्या मिलता था तो उन्होंने बताया कि बस्तर में जैसा हम आदिवासियों का भोजन होता है वैसा ही खाना माओवादी खाते थे और उसे भी वही खाना खाने के लिए देते थे. संतोष ने हमें बताया कि माओवादी उबला खाना चावल के साथ दाल में ही सब्जी या सुकसी (सुखाई हुई मछली) वगैरह डालकर पकाकर बनाते थे. संतोष को कहा गया था कि यहाँ से भागने कि कोशिश बिल्कुल मत करना और उसने ऐसा ही किया. उसके साथ हमेशा करीब 12 माओवादी रहते थे, जिसमें करीब 06 महिलाएं और 06 पुरुष नक्सली उस पर नजर रखते थे.

11 मई को जन अदालत लगना था लेकिन उसकी सुचना बीजापुर के पत्रकारों को पहले ही लग गई. संतोष कट्टम के मुताबिक नक्सली कमांडर उससे बोल रहा था कि जन अदालत के बाद उसे बीजापुर के पत्रकार को सौंप देंगे. पत्रकारों के साथ जाना चाहोगे कि अकेले जाओगे. स्थानीय पत्रकारों के वहाँ पहुँचने से पहले ही संतोष को जनता के सामने आत्मसमर्पण करने का फैसला माओवादी कमांडर ने रात में ही उसे सुना दिया था.

संतोष ने आगे बताया कि बीजापुर के पत्रकार गणेश मिश्रा के साथ उनके दो कैमरामैन साथी भी आये थे. करीब साढ़े 03 बजे जन अदालत लगी. जो चेरपाल से 05 किलोमीटर अंदर किसी गाँव में लगाया गया था. उसे माओवादियों ने उस जन अदालत में सबोधन करने के लिए कहा कि आप अपने किये की माफ़ी मांगों और कहो कि मैं आज के बाद पुलिस की नौकरी छोड़ दूँगा और सुकमा जिला चला जाऊँगा. उसे माओवादी कमांडर ने यह भी संबोधन करने के लिए कहा कि तुम भटके हुए पुलिस वालों को यहाँ से रिहाई के बाद कहो कि वापस गाँव आयें, उन्हें हम जमीन दिलवाएंगे. उसने नक्सलियों की बात मानकर जनता को संबोधित किया जिसके बाद उसकी रिहाई मुक़र्रर हुई. उससे कागज़ पर भी लिखवाया गया है.

 इस मामले का सबसे मार्मिक पहलु यह है कि संतोष कट्टम की पत्नी के साथ उसकी मंझली बेटी भावना कट्टम भी पत्रकारों के साथ जन अदालत तक पहुँचने में कामयाब रही हैं. पत्नी सुनीता ने जनअदालत में माओवादी नेताओं और आदिवासी ग्रामीणों को धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा कि आपका बहुत बहुत धन्यवाद हम छोटा मोटा काम कर जी लेंगे.

संतोष का कहना है कि उसका स्थानान्तरण सुकमा कर दिया जाए ताकि वह स्थानीय लोगों की पुलिस की नौकरी के साथ सेवा कर सके लेकिन अभी फिलहाल यदि उसका स्थानातरण नहीं होता है तो वह पुलिस की नौकरी छोड़ने का मन बना चूका है. उसका कहना है कि यहाँ रहकर पुलिस की नौकरी करूँगा तो उसे माओवादी जिन्दा नहीं छोड़ेंगे. उससे अच्छा है मैं रिटायरमेंट ले लूँगा.

संतोष से बातचीत में हमें लगा कि उसने जंगल में आदिवासियों के साथ हुए पुलिसिया ज्यादती को इन 07 दिनों के दौरान काफी करीब से देखा है. जिसके कारण पुलिस कि नौकरी को लेकर अब उसका मन उचट सा गया है. संतोष का कहना है कि पुलिस के जवान जो अनावश्यक ग्रामीणों को प्रताड़ित करते हैं वे यह सब न करें.

संतोष को माओवादियों ने बताया है कि वो (माओवादी) आदिवासियों के साथ जल जंगल जमीन की रक्षा कर रहे हैं और जो स्थानीय लोग पुलिस बनकर जनता के खिलाफ हो गए हैं उन्हें वापस आना चाहिए उन्हें गाँव में माओवादी जमीन वापस दिलाएंगे. यदि जमीन ऐसे ही बंजर हो गई तो सरकार उनसे उनकी जमीन छीन लेगी. बीजापुर के स्थानीय पत्रकार गणेश मिश्रा और उनके साथियों के साथ 11 मई सोमवार को करीब 06 बजे वे बीजापुर पहुँच गये. सोमवार की रात में सोनी सोरी की बात आरक्षक के परिवार से हुई. सोनी सोरी ने आरक्षक संतोष कट्टम की सकुशल रिहाई पर उन्हें बधाई दिया है.

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