छत्तीसगढ़

भूख के विरुद्ध, भात के लिये: किसान सभा के देशव्यापी आह्वान पर सैकड़ों गांवों में ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन

  • संजय पराते, अध्यक्ष छत्तीसगढ़ किसान सभा (CGKS) (अ. भा. किसान सभा – AIKS से संबद्ध) की प्रेस

रायपुर @ कोरोना महामारी और अनियोजित लॉक डाउन के कारण किसानों, ग्रामीण गरीबों, दिहाड़ी और प्रवासी मजदूरों तथा आदिवासियों के समक्ष उत्पन्न समस्याओं को हल करने के लिए केंद्र सरकार की उदासीनता के खिलाफ अखिल भारतीय किसान सभा के देशव्यापी आह्वान पर आज छत्तीसगढ़ में भी सैकड़ों गांवों में प्रदर्शन किए गए। छत्तीसगढ़ किसान सभा द्वारा इस आंदोलन को भूख के विरूद्ध, भात के लिए नाम दिया गया था। इसी प्रकार के विरोध-प्रदर्शनों का आह्वान आदिवासी एकता महासभा, सीटू, जनवादी महिला समिति और जनवादी नौजवान सभा आदि जन संगठनों के द्वारा भी किया गया था, जिसके चलते यह आंदोलन गांवों से बाहर निकलकर शहरों की झुग्गी-बस्तियों और खदानों के गेटों तक पहुंच गया और कई जगहों पर छात्रों और युवाओं ने भी बड़ी संख्या में हिस्सेदारी की।

यह जानकारी छत्तीसगढ़ किसान सभा के राज्य अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने आज यहां दी। उन्होंने बताया कि कोरबा, दुर्ग, रायपुर, धमतरी, बिलासपुर, मरवाही, सूरजपुर, बलरामपुर, बागबाहरा, सरगुजा, बस्तर, कोरिया, रायगढ़ और चांपा-जांजगीर जिले सैकड़ों गांवों में ये विरोध-प्रदर्शन आयोजित किये गए। कोरोना महामारी के प्रकोप और फिजिकल डिस्टेंसिंग को बनाये रखने के प्रोटोकॉल को ध्यान में रखकर आयोजित किये गए।

इस आंदोलन में लोगों ने अपने घरों के आंगन में इकट्ठे होकर, छत पर चढ़कर या गलियों में इकट्ठा होकर नारे लिखे पोस्टर लहराकर, नारेबाजी करके और थालियों को बजाकर अपने भूखे होने का इज़हार किया और उनकी आजीविका की समस्या के प्रति मोदी सरकार की उदासीनता का विरोध करते हुए उन्हें हल करने के लिए एक सर्वसमावेशी पैकेज देने की मांग की। कोरबा में माकपा की दोनों महिला पार्षदों राजकुमारी कंवर और सुरती कुलदीप मोंगरा और भैरोताल वार्ड में प्रदर्शनकारी महिला जत्थों का नेतृत्व किया।

कई स्थानों पर माकपा और किसान सभा के नेताओं ने प्रदर्शनकारियों के समूहों को गांवों के अंदर संबोधित किया।अपने संबोधन में उन्होंने आरोप लगाया कि कोरोना संकट की सबसे ज्यादा मार समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लोगों को झेलनी पड़ रही है, लेकिन केंद्र सरकार ने लॉक डाउन के दौरान उनकी आजीविका को हुए नुकसान की भरपाई के लिए और खेती-किसानी को बर्बाद होने से बचाने के लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं।

उन्होंने कहा कि अनियोजित लॉक डाऊन के कारण देश के करोड़ों लोगों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है और वे कोरोना से कम भूख से ज्यादा मर रहे हैं। केंद्र की मोदी सरकार और राज्य में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार — दोनों लोगों की रोजी-रोटी को हुए नुकसान की भरपाई किये बिना ही फिजिकल डिस्टेंसिंग के सहारे कोरोना संकट से लड़ना चाहती है, जबकि अब यह स्पष्ट है कि आम जनता को सामाजिक सुरक्षा दिए बिना इस महामारी से लड़ा नही जा सकता।

आंदोलनकारी ग्रामीणों के समूहों को संबोधित करने वालों में प्रशांत झा, सुखरंजन नंदी, जवाहरसिंह कंवर, दिलहरण बिंझवार, कृष्णकुमार, अयोध्याप्रसाद रजवाड़े, हरकेश दुबे, पूरन दास, योगेश सोनी, ललन सोनी, शीतल पटेल आदि प्रमुख थे। उन्होंने कृषि कार्यों को मनरेगा से जोड़ने, रबी फसलों, वनोपजों, सब्जियों और दूध को सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदे जाने, सभी ग्रामीण परिवारों को 7500 रुपये मासिक आर्थिक सहायता देने, मुफ्त राशन वितरण में धांधली बंद करने, खेती-किसानी और मजदूरी करने वाले सभी लोगों को मास्क, दस्ताने, साबुन या सैनिटाइजर मुफ्त उपलब्ध कराने, शहरों में फंसे ग्रामीण मजदूरों को सुरक्षित ढंग से उनके गांवों में पहुंचाने, खेती-किसानी को हुए नुकसान के लिए प्रति एकड़ 10000 रुपये मुआवजा देने, किसानों से ऋण वसूली स्थगित करने और खरीफ सीजन के लिए मुफ्त बीज, खाद और कीटनाशक देने, राशन दुकानों से दैनिक उपभोग की सभी आवश्यक वस्तुओं को सस्ती दरों पर देने की मांग की। उन्होंने कहा कि इन मांगों पर अमल करके ही देश में फैलती भुखमरी की समस्या पर काबू पाया जा सकता है। ग्रामीण किसानों का विरोध-प्रदर्शन कल भी जारी रहेगा।

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