Home » बस्तर » Ground Report: बैलाडीला की पहाड़ी आस्था, जमीन, जंगल, पानी और एनएमडीसी-अडानी के खिलाफ आंदोलन की राह पर निकले थे आदिवासी
बस्तर

Ground Report: बैलाडीला की पहाड़ी आस्था, जमीन, जंगल, पानी और एनएमडीसी-अडानी के खिलाफ आंदोलन की राह पर निकले थे आदिवासी

Read Time13Seconds

उत्तम कुमार ( संपादक दक्षिण कोसल) बैलाडिला आंदोलन पर ग्राउंड रिपोर्ट @ खबरी चिड़िया सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) ने अध्ययन के आधार पर यह खुलासा किया है कि औषधीय पेड़-पौधें की विविधता से भरपूर बेहद घने और सदाबहार वनों से आच्छादित बैलाडिला की पहाडिय़ां राज्य में बड़े प्राकृतिक और पर्यावरण खजाना है। यहां उच्च किस्म का लौह अयस्क भंडार भी है। 1961 से राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) इन प्राकृतिक भंडारों को खंगाल रहा है। इस अयस्क के जापान निर्यात को सहज बनाने के लिए रेललाइन बिछाई गई और इस तरह इस क्षेत्र में बाहरी लोगों का प्रवेश हुआ। खनन गतिविधियों उसके साथ शुरू हुए औद्योगिकीकरण से इस क्षेत्र में खासकर किरंदुल, बचेली और भांसी में व्यापक तबाही हुई। 1997 के एक दूरसंवेदी अध्ययन में वन क्षेत्र घटने की पुष्टि हुई। स्थानीय जल स्त्रोत शंखिनी ओर डंकिनी नदियां प्रदूषित हो गई है, शंखिनी तो अब लाल पानी कहलाने लगी है। फिर भी, इसके किनारे बसे करीब 100 गांवों के लोग के दैनिक जरूरतों के लिए नदी जल ही एकमात्र आधार है। लगभग चार दशकों से एनएमडीसी बैलाडिला खदानों से निकला कचरा सीधे शंखिनी में बहा देता है। इसका कुछ कीचड़ खदानों के पास कदमपाल गांव के कई बांध में जमा होता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नदी को साफ करने के निर्देश के बाद बांध से उम्मीद यह की गई थी कि कीचड़ तलहटी में बैठ जाएगा और नदी में साफ पानी ही जाएगा। इसका इच्छित परिणाम नहीं हुआ।

लिहाजा नदी में गहरे लाल रंग का पानी बहता है। नदी की धारा आगे बढऩे और किनारों पर कचरा बैठ जाने से पानी का रंग कुछ हल्का मटमैला लाल होता जाता है। पहले निकला कचरा और कीचड़ बांध के पास जमा होते होते काले रंग के पठार में बदल गया है, वन पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक इलाके के कई प्राकृतिक जल स्त्रोतों की धारा बदल गई है। कई हेक्टेयर की खेती और जंगल बरबाद हुए हैं शंखिनी और डंकिनी नदियों के पास के 65 गांव प्रभावित हुए हैं इस बरबादी के बावजूद 1998 में बैलाडिला के रावघाट में नई खदान का प्रस्ताव पेश किया गया है। मंत्रालय ने कहा कि इससे 1000 हेक्टेयर घना वन क्षेत्र उजड़ जाएगा। कंपनी को रावघाट की खदानों की बेतहाशा जरूरत थी क्योंकि दल्ली राजहरा में उसको अपनी खदानों का भंडार तेजी से खत्म हो रहा था। इसलिए उसने एक नई योजना पेश की जिसमेें एक नई तकनीक ड्राबेनेफिकेशन संयंत्र लगाने की बात थी। राज्य सरकार ने भिलाई इस्पात संयंत्र को रावघाट में खुदाई के लिए अपनी आधिकारिक मंजूरी जनवरी 2007 में दे दी। जैवविविधता योजना की एक पहल में बैलाडिला पहाडिय़ां को जैवविविधता सघन क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की गई है। इसका यह भी मानना है कि एनएमडीसी को उजाड़े गए क्षेत्र में जैवविविधता के पुनर्जीवित और बाकी बचे इलाकों के संरक्षण का जिम्मा उठाना चाहिए।

खदान वाले क्षेत्र में खनन का काम बंद करने और हरियाली के संरक्षण के लिए वन रोपण की योजनाएं चलाई गई लेकिन कंपनी ने गुलमोहर और यूक्लीपटस के पौधे रोपे, जो यहां के लिए विजातीय है।नियामगिरी आंदोलन की तरह एक बड़ा भूमि संघर्ष जिसने कुछ साल पहले ओडिशा के गांवों में आदिवासियों ने एक खनन परियोजना का विरोध किया था, जिसने इसे रद्द कर दिया था कुछ ऐसा ही दंतेवाड़ा जिला के बैलाडीला पहाडिय़ों की रक्षा में आंदोलन अपना रूप लेता दिखा। लगभग 25 हजार आदिवासियों ने शुक्रवार यानी 7 जून को छत्तीसगढ़ के बस्तर में बैलाडीला पहाडिय़ों में एनएमडीसी को आवंटित एक लौह अयस्क खदान के खिलाफ जंगी विरोध प्रदर्शन किया। नक्सल प्रभावित बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में एनएमडीसी को बैलाडीला डिपॉजिट -13 आवंटित किया गया था। राज्य द्वारा संचालित लौह अयस्क खननकर्ता क्षेत्र में किरंदुल तथा बचेली यंत्रीकृत खानों का संचालन करता है। विश्वस्तरीय लौह अयस्क भंडारों से संपन्न बैलाडीला पहाडिय़ों का एक बड़ा हिस्सा माओवादियों के मजबूत प्रभाव में रहा है। एनएमडीसी ने 2008 में छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (सीएमडीसी) के साथ एक संयुक्त उद्यम का गठन किया। नई इकाई एनसीएल (एनएमडीसी-सीएमडीसी) ने 2015 में पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त की, जो खदान के पट्टे क्षेत्र में फैले हुए खदान से 10 मिलियन टन लौह अयस्क का था 413.74 हेक्टेयर में। डिपॉजिट -13 में उच्च श्रेणी के स्टील बनाने वाले कच्चे माल का 326 मिलियन टन का विशाल भंडार है।

एनसीएल ने खदान के विकास और संचालन के लिए निजी कंपनियों से प्रस्ताव आमंत्रित करते हुए एक वैश्विक निविदा मंगाई। बोली में भाग लेने वाली 10 कंपनियों में से, अदानी एंटरप्राइजेज (एईएल) को सफल बोलीदाता के रूप में चुना गया और दिसंबर 2018 में खनन ठेकेदार के रूप में नियुक्त किया गया। बताया जाता है कि नंदराज पहाड़ी और पिट्टोड रानी के इस विशालकाय कच्चा लोहा से परिपूर्ण पहाड़ में 35 करोड़ टन कच्चा माल मौजूद है जिसे उत्खनन करने के लिए एनएमडीसी और सीएमडीसी के साथ बड़े पूंजीपति अडानी तत्पर हैं। बताया जाता है कि 80 पंचायत के लोग इस पहाड़ जिसे हम एनएमडीसी की भाषा में डिपोजिट 13 कहते हैं बचाने के लिए अपने घर से राशन पानी इंधन के साथ पहुंचे थे। 413 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला 326 मैट्रिक टन कच्चा लोहा जो दुनिया का सबसे अच्छा कच्चा लोहा में गिनती होती है उसके उत्खनन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। अब तक लगभग 3 लाख पेड़ इन अनुसूचित क्षेत्र में काट लिए गए हैं। सात दिनों तक चली इस आंदोलन में 200 आदिवासियों का स्वास्थ्य खराब हो चुका था। इस ज्वाइंट वेंचर में एनएमडीसी और सीएमडीसी के बीच 51 अनुपात 49 का शेयरहोल्डर है।

एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि उत्खनन और खदान विकास का ठेका अडानी एंटरप्राइजेस को माइन डेवलपर-कम-ऑपरेटर (एमडीओ) के रूप में काम करने के लिए दिया गया है। राज्य के स्वामित्व वाली एनएमडीसी ने 7 जून को कहा कि बैलाडिला लौह अयस्क डिपॉजिट-13 को एक संयुक्त उद्यम के तहत विकसित किया जा रहा है, जबकि यह स्पष्ट है कि इसका खनन पट्टा अडानी एंटरप्राइजेज को हस्तांतरित नहीं किया जाएगा जो परियोजना के लिए एक खान-डेवलपर-सह-ऑपरेटर है। आदिवासियों का शेयर पर चर्चा ही नहीं होती है।डिपाजिट -13 को एनसीएल द्वारा विकसित किया जा रहा है – एनएमडीसी और छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (सीएमडीसी) के बीच संयुक्त उद्यम का समझौता है। एनसीएल के सीईओ वी एस प्रभाकर ने कहा कि डिपॉजिट -13 के लिए लीज होल्डर एनसीएल है और एनसीएल को छोडक़र कोई भी लीज को किसी को भी ट्रांसफर नहीं कर सकता है। वे आगे कहते हैं कि निहित स्वार्थ वाले कुछ लोग प्रचार प्रसार कर रहे हैं कि लीज 25 साल की अवधि के लिए अडानी एंटरप्राइजेज को हस्तांतरित की गई है, जो सच नहीं है। उन्होंने कहा कि अडानी एंटरप्राइजेज केवल लौह अयस्क की खुदाई कर सकता है और इसे रेल प्रमुख को दे सकता है।

एनएमडीसी ने एक बयान में कहा कि छत्तीसगढ़ में 10 मैट्रिक टन प्रतिवर्ष क्षमता वाली बैलाडिला लौह अयस्क डिपाजिट -13 को संयुक्त उद्यम के तहत एनएमडीसी-सीएमडीसी लिमिटेड (एनसीएल) के तहत विकसित किया जा रहा है।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल खुदाई और खान विकास का अनुबंध अडानी एंटरप्राइजेज को माइन डेवलपर-कम-ऑपरेटर के रूप में काम करने के लिए दिया गया है। आदिवासियों ने बातचीत में बताया कि अपने देवता, पिथोड़ रानी और नंदराज के रूप में खनन की अनुमति नहीं देंगे। एनएमडीसी ट्रेड यूनियन इस सौदे का इन आदिवासियों के साथ विरोध कर रही है, जिसमें कहा गया है कि कंपनी ऑपरेशन का निजीकरण कर रही थी। जल्द ही, स्थानीय आदिवासी विरोध में शामिल हो गए।एनएमडीसी ने शुक्रवार को कहा कि डिपॉजिट -13 को एक ज्वाइंट वेन्चर के तहत विकसित किया जा रहा है, जबकि यह स्पष्ट है कि इसके खनन पट्टे को एईएल को हस्तांतरित नहीं किया जाएगा जो परियोजना के लिए एक खान-डेवलपर-सह-ऑपरेटर है। एईएल ने यह भी कहा कि एनसीएल खानों का मालिक है।एईएल ने यह भी कहा कि एनसीएल खानों का मालिक है।

एईएल केवल एक अनुभवी और जिम्मेदार खनन ठेकेदार के रूप में समर्थन प्रदान करता है, कंपनी ने एक बयान में कहा कि कंपनी को पारदर्शी रिवर्स बिडिंग प्रक्रिया के माध्यम से सफल बोलीदाता के रूप में चुना गया था। माओवादियों द्वारा आंदोलन की अगुवाई करने की संभावना से इनकार नहीं किया गया था। दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक अभिषेक पल्लव ने कहा, हमारे पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि माओवादी आंदोलन में शामिल हैं। पुलिस ने ग्रामीणों से खनन का विरोध करने और आंदोलन का समर्थन करने के लिए माओवादी पर्चे बरामद किए थे, उन्होंने कहा कि आयोजकों ने प्रशासन से अनुमति नहीं ली थी। यहां यह भी गौरतलब है कि क्या ग्राम सभा संचिलित करने वालों को प्रशासन से आंदोलन की अनुमति की जरूरत है? पूरे आंदोलन में प्रारंभ से शामिल सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी कहती है कि ‘इस आंदोलन के पहले हम छोटे छोटे टुकड़ों में कई बार गांव के बैठकों में शामिल हुए। कई प्रकार के मुद्दों जैसे कोई जेल जा रहा है या इनकाउंटर हो रहा है। लेकिन नंदराज पहाड़ी को बचाने का मुद्दा हर समय रहा है। मेरा हमेशा मानना रहा है कि एक बड़ा आंदोलन होना चाहिए। और तमाम लोगों के बीच यह मुद्दा आना चाहिए। फिर सवाल आया नेतृत्व कौन करेगा? मैंने कहा नेतृत्व तो नहीं कर सकती हां पूरे आंदोलन के दौरान मैं साथ रहूंगी।

सभी पंचायतों का एक संघर्ष समिति बनेगा। बातें तो होती गई लेकिन पूरे आंदोलन को सफलतापूर्वक संचालन के लिए एक ड्राफ्ट हम लोग नहीं बना पाए। सांसद दीपक बैज के सामने तीन मांग रखे गये पहला यह कि वन कटाई रूकना चाहिए दूसरा जो ग्राम सभा हुई है उसे फर्जी करार देते हुए रद्द करे और दूसरा ग्राम सभा बुलाया जाए और दोषियों पर एफआईआर हो। तीसरा काटे गए पेड़ों की जांच पड़ताल होनी चाहिए और दोषियों पर एफआईआर होनी चाहिए। इसके बाद मामला यहीं नहीं ठहरा बल्कि कुछ लोगों ने इन सर्वसम्मति से उठाए मांगों को खारीज करते हुए अदानी के साथ एमडीओ और ग्रामसभा को रद्द करने के मांग को जोर दिया। बात यह भी उठी की तमाम जांच और मांगों को अमलीजामा 15 दिनों के अंदर होना चाहिए। हां कुछ गलतियों के कारण आंदोलन कमजोर तो हुआ है।आंदोलन को संचालन के लिए संयुक्त पंचायत संघर्ष समिति के सदस्य राजू भास्कर ने कहा कि आंदोलन को हमने तोड़ा नहीं है बल्कि मुद्दों को हल करने के लिए चीजें हमने सांसद के पक्षधरता में सरकार से लिखित में ले लिया है। जो चीज हमें शंकित कर रहा है वह यह कि ग्राम सभा जांच जो गलत हुआ है उसका जांच होगा या नहीं? ग्राम सभा 15 दिन में करेंगे एसडीएम भी कार्रवाई की बात कर रहे हैं। हल नहीं होगा तो जल जंगल जमीन को बचाने उग्र आंदोलन करेंगे। संयुक्त पंचायत का एक टीम गठित कर ग्राम सभा की बात हो रही है। इन्टुक और एसकेएसएस हमारा समर्थन किया है।

अगर मांग पूरी ना हुई तो जनप्रतिनिधि के साथ लोगों को लेकर आएंगे। अदानी के साथ 25 साल का एमडीओ हमको भी समझ नहीं आया है। हमने पहले भी एस्सार का विरोध किया है। हम पांच उंगली एक होकर आंदोलन में उतरे हैं। डीएमएफ का पैसा कहां जा रहा है हमको मालूम नहीं 20 किलोमीटर के दायरे में प्रोजेक्ट का विकास नहीं दिखता है। 15 दिन के बाद हम फिर लौटेंगे। प्रोजेक्ट में जो भर्ती हुआ उसमें आदिवासियों को शामिल नहीं किया गया है। इस कारण बाहरी लोगों का दबदबा बढ़ता जा रहा है।संरपंच शंकर कुंजाम ने कहा कि सरकार और जिला प्रशासन जांच होने के बाद पुन: ग्राम सभा प्रस्ताव पास होने चाहिए। पंचायतों के लोगों का कहना है उस पहाड़ को हम नहीं देंगे। जांच होगा और अदानी के साथ एमडीओ रद्द होगा। दबाव तो था लेकिन सरकार हमारे बातों से भी सहमत नजर आई। आंदोलनकारी रामलाल नय्या ने तल्खी के साथ कहा कि ग्राम सभा होता है लेकिन मान्यता नहीं देते हैं वो दो चार लोग बैठकर कथित ग्रामसभा में प्रस्तमाव पास कर देते हैं। अगर दमन होता है तो उसका मुकाबला करने तैयार हैं। तीनों जिलों से 200 गांव के लोग इस आंदोलन में शामिल हुए हैं। पंचायत ने सहयोग किया। हम तो जब तक मांग पूरी ना हो जाना ही नहीं चाहते हैं।

आंदोलन में शामिल लाला राम सोरी ने कहा कि इस आंदोलन को मैं असफल होता देख रहा हूं। इस असफलता के लिए किसी नेता को दोषी नहीं देते। आंदोलन को पंचायत और कई लोगों का समर्थन है। कई ट्रेड यूनियन वाले भी हमारा समर्थन किया है। आंदोलन में जुझारू कार्यकर्ता मरकाम लिंगा ने बताया कि इस पहाड़ी का उत्खनन करने नहीं देंगे। हमार गांव के पास का पानी लाल हो गया है। अदानी को नहीं देना ऐसा बातचीत तो नहीं हुआ है। हमारे ग्राम में ग्राम सभा नहीं बैठता है। यह ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित नहीं हुआ है। कटेकल्याण, सुकमा से भी इस आंदोलन में भारी संख्या में लोग आएं हैं।आदिवासी लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग ‘छत्तीसगढ़ के जंगलों को निगलता विकास का दानव’ शीर्षक लेख में लिखते हैं कि बैलाडीला आंदोलन ने देश में एक बार फिर यह बहस छेड़ दिया है कि क्या विकास के नाम पर जंगलों और पहाड़ों को उजाडऩा सही है? क्या विकास के नाम पर कारपोरेट जगत को फायदा पहुंचाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन उचित है? देश में जलवायु परिवर्तन के असर को देखते हुए क्या हमलोग बचे-खुचे जंगल और पहाड़ों को उजाडऩे की इजाजत दे सकते हैं? यह हैरान करने वाली बात है कि बैलाडीला में ‘पृथ्वी पुरूष’ के मित्र गौतम अदानी की कंपनी ‘अदानी इंटरप्राईजेज प्रा. लि. के द्वारा लौह-अयस्क का उत्खनन करने के लिए 2,000 हजार पेड़ों को काटकर, जलाते हुए राख में तब्दील कर दिया गया। अडानी कंपनी ने 25,000 पेड़ों को काटने के लिए सरकार से अनुमति हासिल कर ली है। यह संख्या सिर्फ बड़े पेड़ों की है।

छोटे-छोटे पेड़ और पौधों को नहीं गिना गया है। इन्हें कौन गिनेगा? क्या इनके अस्तित्व को नकारना सही है? यदि सभी पेड़-पौधों को गिना जायेगा तब यह संख्या लाखों में होगी। यह सोचनीय बात है कि जब खनन कार्यों के लिए सरकार हजारों पेड़ों को कटवाती है और कारपोरेट घरानों को जंगल उजाडऩे की अनुमति देती है तब उसे वैध कहा जाता है। लेकिन जब जंगलों की रक्षा करने वाले आदिवासी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पेड़ काटते हैं तब सरकार उसे अवैध करार देती है और पेड़ काटने वाले आदिवासियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल में डाल देती है। ऐसी दोहरी मापदंड क्यों है? जबकि हकीकत यह है कि जिन इलाकों में आदिवासी रहते हैं वहीं जंगल बचा हुआ है।अनुमान लगाया गया है कि राज्य द्वारा संचालित राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) को प्रतिदिन लगभग 12 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है क्योंकि कंपनी को आवंटित एक खदान के विरोध में आदिवासियों की हड़ताल के बाद छत्तीसगढ़ की परियोजनाओं पर परिचालन ठप हो गया है। शुक्रवार से, आंतरिक क्षेत्रों के हजारों आदिवासियों ने दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल और बचेली शहरों में डेरा डाला है, जहां एनएमडीसी मैकेनाइज्ड खदानों में से दो का संचालन करता है।

आंदोलनकारी बैलाडिला डिपॉजिट में प्रस्तावित खनन का विरोध कर रहे हैं क्योंकि डिपोजिट 13, में उनका दावा है यहां उनके देवता हैं।एनएमडीसी, जिसे बिलाडिला डिपॉजिट-13 आवंटित किया गया था, ने खदान को विकसित करने और संचालित करने के लिए 2008 में छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (सीएमडीसी) के साथ एक संयुक्त उद्यम बनाया। नई इकाई एनसीएल (एनएमडीसी-सीएमडीसी) ने 2015 में चोटी की क्षमता के लिए 10 मिलियन टन (मिलियन टन) लौह अयस्क की खुदाई के लिए पर्यावरण मंजूरी प्राप्त की। जमा -13 में उच्च श्रेणी के लौह-अयस्क का 326 मिलियन टन का विशाल भंडार है। अदानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) ने खदान के विकास और संचालन के लिए वैश्विक बोली जीतने के लिए दौड़ में 10 कंपनियों के बीच योग्यता हासिल की। कंपनी को दिसंबर 2018 में खनन ठेकेदार के रूप में नियुक्त किया गया था। यह कहते हुए कि वे जमा संख्या 13 में खनन की अनुमति नहीं देंगे, आदिवासी एनएमडीसी खानों के चेक-पोस्ट के बाहर धरना दे रहे थे जिसने कर्मचारियों के प्रवेश को अवरुद्ध कर दिया था। इसके बाद, दोनों परियोजनाओं में उत्पादन रुक गया था। हालांकि अधिकारियों ने इसके आदेश पर सीमित संसाधनों के साथ बचेली ऑपरेशन चलाने में कामयाबी हासिल की लेकिन सोमवार सुबह इसे भी रोक दिया गया।

संयुक्त पंचायत समिति के बैनर तले आयोजित हड़ताल को एनएमडीसी ट्रेड यूनियन का समर्थन मिला। ट्रेड यूनियनों ने एईएल को दिए गए अनुबंध का विरोध करते हुए दावा किया है कि यह निजीकरण प्रक्रिया का हिस्सा था। बस्तर के कांग्रेस सांसद दीपक बैज ने भी धरना स्थल पर जाकर अपना समर्थन दिया था। माओवादियों द्वारा आदिवासियों को भडक़ाने और आंदोलन में शामिल होने के लिए आंतरिक इलाकों से भेजने की आशंका के चलते सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर थीं। पारंपरिक हथियार धनुष-बाण के साथ 200 गांवों के आदिवासी राशन के साथ घटनास्थल पर भी पहुंच गए थे, दंतेवाड़ा के पुलिस प्रमुख अभिषेक पल्लव ने दावा किया था कि माओवादियों के पर्चे और पोस्टर ग्रामीणों को विरोध में शामिल होने के लिए कहते हैं और खनन का विरोध करते हुए आंतरिक क्षेत्रों से बरामद किया गया था।अंतत: एनएमडीसी की दो प्रमुख सुविधाओं में उत्पादन छह दिन बाद फिर से शुरू हो गया क्योंकि कंपनी को आवंटित एक खदान के खिलाफ आंदोलनरत आदिवासियों ने गुरुवार सुबह हड़ताल खत्म कर दी। एनएमडीसी सारे मैकेनाइज्ड खदानों को देश का सबसे बड़ा लौह-अयस्क उत्पादक और निर्यातक खदानों में से से दो छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित हैं। कंपनी बचेली और किरंदुल नामक दो परिसरों का संचालन करती है। दो परिसरों की क्षमता 25 मिलियन टन प्रति वर्ष है। यह एनएमडीसी के कुल लौह-अयस्क उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा है।

आदिवासी एनएमडीसी को आवंटित किए गए बैलाडीला डिपॉजिट -13 का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि पहाड़ी का उनके लिए धार्मिक महत्व है क्योंकि यह उनके देवता का घर है। आदिवासी इस बात पर अड़े थे कि वे किसी भी कीमत पर खदान को उनके मांगो के ना मानने तक नहीं शुरू होने देंगे। कई लोगों ने घटनास्थल पर पहुंचने के लिए 50 किलोमीटर की यात्रा की। पुलिस द्वारा बरामद पर्चे ने रेखांकित किया कि माओवादी निजी पार्टी को आवंटित खदान का विरोध कर रहे थे। अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) को खनन ठेकेदार के रूप में नियुक्त किया गया था। एनएमसीएल और छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (सीएमडीसी) के संयुक्त उपक्रम एनसीएल को जमा के लिए खनन पट्टा जारी किया गया था।राज्य सरकार ने मंगलवार को परियोजना से संबंधित कार्यों को तत्काल रोकने का आदेश जारी किया। इसने पेड़ों की अवैध कटाई की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। सरकार ने 2014 में आयोजित ग्राम सभा की जांच करने का आश्वासन दिया था कि ग्रामीणों ने उस ग्राम सभा नकली करार दिया है। अधिकारियों का कहना है कि ग्राम सभा ने 10 मैट्रिक टन प्रतिवर्ष खदान के विकास के लिए सहमति दी थी। बुधवार रात एनएमडीसी के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक एन बैजेंद्र कुमार ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात की। हड़ताल एक नई खदान के खिलाफ थी, लेकिन इसने मौजूदा खदान के संचालन को बुरी तरह प्रभावित किया था।

13 जून की रात, किरंदुल के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट ने एक आदेश जारी कर आंदोलनकारियों को आधी रात तक जगह खाली करने या सख्त कार्रवाई का सामना करने के लिए कहा। अधिकारियों ने आदिवासियों को किरंदुल से बाहर निकालने की योजना बनाई थी। कड़ी कार्रवाई के डर से, अधिकांश गांव के ग्रामीण रात में सुरक्षित स्थानों में पहुंच गए थे। बाद में अपने अगुवा साथी के कहने पर गुरुवार सुबह वे वापस अपने मूल स्थान लौट गए हैं। प्रशासनिक अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और अभियान की अगुवाई कर रहे नेताओं से बात की। अधिकारियों ने उन्हें बताया कि बल प्रयोग के लिए उन्हें कोई विकल्प नहीं छोड़ा जाएगा। अंत में, हड़ताल को बंद कर दिया गया। इस आंदोलन में कई कई किलोमीटर पैदल चल कर पहुंचे आदिवासी अपने मूल स्थान के लिए ट्रकों पर सवार नजर आए।लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग की चिंता गंभीर हैं वे लिखते हैं ‘देश के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। लोग भीषण गर्मी से तबाही झेल रहे हैं और सत्ताधीश विकास के नाम पर जंगलों को पूंजीपतियों को सौंपते जा रहे हैं। इसी सच्चाई को छुपा कर रखने के लिए गोदी और मोदी मीडिया के द्वारा यह अफवाह फैलाया जा रहा है कि देश में गर्मी का कारण पाकिस्तान के द्वारा भेजा गया गर्म हवा है। ऐसी स्थिति में यदि लोग अभी भी सच्चाई से मुंह मोड़ते रहेंगे, भाजपा-कांग्रेस करते रहेंगे और सत्ताधीशों को तथाकथित विकास के नामपर जंगलों को उजाडऩे देते रहेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब तापमान 50-55 डिग्री के पार चला जायेगा और हमारे पास तड़प-तड़पकर मरने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा।’

हमारे देश में जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को बचाने के लिए संघर्षरत आदिवासियों को विकास विरोधी कहा जाता है। लेकिन अभी यह समझने की जरूरत है कि यदि आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए संघर्षरत है तो वे न सिर्फ आदिवासी समुदाय और प्रकृति को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं बल्कि धरती और जीवन का भविष्य उनके संघर्ष पर टिका हुआ है। इसलिए अब उन्हें विकास विरोधी बोलने के बजाय हमें उनके संघर्ष का हिस्सा बनना चाहिए। प्रकृति और जीवन विरोधी विकास को न कहने का सही समय यही है। यदि हम आज भी नहीं चेते तो निश्चितरूप से कल हमारा नहीं होगा।दंतेवाड़ा में कंपनी के अधिकारियों ने कहा कि दोनों परियोजनाएं प्रति दिन 75,000 टन लौह अयस्क का उत्पादन कर रही थीं, जो आज सुबह से पूरी तरह से बंद हो गई हो गई थी। एनएमडीसी को प्रतिदिन 12 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा था, उन्होंने कहा कि अब तक कंपनी को 35-40 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ सरकार भी प्रति दिन 10 करोड़ रुपये का घाटा उठा रही है, जो एनएमडीसी से रॉयल्टी के रूप में और जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) से कमा रही थी। दंतेवाड़ा में कंपनी के अधिकारियों ने कहा, दोनों परियोजनाएं प्रति दिन 75,000 टन लौह अयस्क का उत्पादन कर रही थीं, जो आज सुबह से पूरी तरह से बंद हो गई हो गई थी।

एनएमडीसी को प्रतिदिन 12 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा था, उन्होंने कहा कि अब तक कंपनी को 35-40 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ सरकार भी प्रति दिन 10 करोड़ रुपये का घाटा उठा रही है, जो एनएमडीसी से रॉयल्टी के रूप में और जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) से कमा रही थी। इसकी तुलना हम डुंगडुंग की बातों से करे तो विकास के नामपर पेड़ों को काटने, जंगलों को उजाडऩे और पहाड़ों को बेचकर पूंजीपति, सत्ताधीश और नौकशाहों का खजाना भरने के लिए हमारे दिमाग में यह डाल दिया गया है कि विकास करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जरूरी है। देश में ऐसा मान्यता स्थापित कर दिया गया है कि विकास करने के लिए पेड़ों को काटना, जंगलों को उजाडऩा और पहाड़ों को बर्बाद करना जरूरी है। इतना ही नहीं प्रकृति के साथ जीने वाले आदिवासियों को असभ्य, जंगली और पिछड़ा कहा जाता है तथा जो लोग कांक्रीट के जंगलों में रहते हैं उन्हें सभ्य, शिक्षित और विकसित। इसलिए बहुसंख्य लोग पेड़ काटने, जंगल उजाडऩे और पहाड़ों को तोडऩे पर सवाल नहीं उठाते हैं और पर्यावरण पर होने वाले असर के बारे में भी बात नहीं करते हैं। जबकि हकीकत यह है कि विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन हो रहा है। देश के जिन आदिवासी बहुल क्षेत्रों से अरबों रूपये का लौह-अयस्क, बाक्साईट, कोयला, इत्यादि निकाला जा रहा है उन क्षेत्र के लोगों को अपनी आजीविका के लिए संषर्घ करना पड़ रहा है और जंगल भी खत्म हो रहा है।

विकास के नाम पर जंगलों को उजाडऩे का आंकड़ा भयावह है। 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगलों को उजाड़ा गया है। इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र से ‘चैम्पियन आफ अर्थ’ पुरस्कार जीतने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में 2014 से 2018 तक 2,347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगलों को विकास नामक दानव के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं 2019 में अबतक 954 परियोजनाओं के लिए 9,383.655 हेक्टेयर जंगलों को विकास की बली बेदी पर चढ़ाया जा चुका है एवं अभी और कई जंगलों और पहाड़ों को विकास के नाम पर उजाडऩे की तैयारी चल रही है। भारत सरकार का ‘वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ देश में मौजूद जंगलों और पहाड़ों को पूंजीपतियों को सौपने के लिए निरंतर प्रयासरत है।इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण मुद्दा जो कहीं खो सा जाता है या फिर इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता है इस संबंध में हमने आंदोलन में पहुंचे कुछ आदिवासी नेताओं से बातचीत की इस चर्चा में आदिवासी नेता अर्जुन सिंह ठाकुर, जनक लाल ठाकुर तथा दुर्गा प्रसाद ठाकुर ने बताया कि सरकार की एनएमडीसी-सीएमडीसी लिमिटेड (एनसीएल), पूंजीपति अदानी और एस्सार अनुसूचित क्षेत्र में ग्राम सभा के शक्ति और उसके प्रस्ताव को नहीं मानते हैं जो अपने आप में संविधान विरोधी हरकत है।

संविधान में निहित स्वशासन और मालिकाना अधिकार को दरकिनार करते हुए बस्तर को 5वीं अनुसूची क्षेत्र में नहीं गिनते है। जब 5वीं अनुसूची में नहीं गिनते हैं तो पेसा कानून और ग्राम सभा का प्रस्ताव गौण हो जाता है। इस कारण विशालकाय एनएमडीसी और आदिवासियों के जिंदगी में अमीरी और गरीबी की एक बड़ी खाई पैदा कर दी गई है जो लगातार संविधान की 5वीं अनुसूची का उलंघन करता है। फर्जी ग्राम सभा यदि हुआ है तो आप नया ग्राम सभा पर जोर क्यों नहीं देते? सरकार क्यों नहीं चाहती है कि वह न्यायोचित नए ग्राम सभा के प्रस्ताव में यह पारित करे कि उनकी कंपनी किसी निजी कंपनी को उत्खनन करने का आदेश नहीं देगी और पर्यावरण और आदिवासियों के जिंदगी को बरबादी के कगार पर नहीं पहुंचाएगी। वे कहते हैं जंहा तक लीज को खत्म करने की बात है यह इसके साथ ही एनएमडीसी, अदानी और एस्सार जैसे देशद्रोही कंपनियों को भी आदिवासी क्षेत्र से हटाना होगा जो लगातार आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं। अगर उत्खनन जरूरत हुई तो आदिवासियों को कंपनी से सरकारी उपक्रम से रॉयल्टी, तथा शेयर होल्डर बनाना होगा।

हिस्सेदारी तथा शेयर देकर मालिकाना और स्वशासन का अधिकार अब तक क्यों नहीं दिया गया? वे तल्खी के साथ कहते हैं कि सरकार तथा उनके उपक्रम के आदेश या फिर कंपनियों की मुंह नहीं ताकनी है बल्कि ग्राम सभा में नया प्रस्ताव लाकर प्रबंधन की जिम्मेदारी अपने हाथ लेनी होगी। राज्यपाल और ट्राइबल एडवाइजरी बोर्ड को इस मामले में सक्रिय होने की जरूरत है। कुलमिलाकर एक स्वयंस्फूर्त आंदोलन नेतृत्व के अभाव में बिखर गया। कुछ लोग अनुभव ना होने से आंदोलन को गलत दिशा में ले गए लेकिन बावजूद बार बार ग्राम सभा की शक्ति को खत्म करने की कोशिश हो रही है। कुछ लोगों ने भावुकतावश अपने अपने खाते में पैसे तथा जनसहयोग तो मंगा ही लिए लेकिन इसका ईमानदारी से उपयोग कितना हुआ देखना बाकी है? ट्रकों में चढ़ रहे आदिवासियों ने कहा कि हम सरकार के कहने पर 15 दिन के लिए जा रहे हैं अगर आलम लूट का ही रहा तो बाद में हम फिर लौटेंगे!

इस ग्राउंड रिपोर्ट की समाप्ति के पूर्व ही संयुक्त पंचायत संघर्ष समिति दंतेवाड़ा जिसने इस पूरे आंदोलन का नेतृत्व किया उन्होंने कहा है कि 7 जून 2019 से आदिवासियों द्वारा अपने पूर्वजों के विरासत इष्ट देव नंदराज गुरु की पत्नी पिटोड़ रानी (डिपॉजिट 13 नम्बर ) की पहाड़ को एनएमडीसी और एनसीएल जॉइंट वेन्चर कम्पनी के द्वारा अदानी इंटरप्राइजेस को दिए गए खदान लीज को रद्द करने किरन्दुल/बचेली (बैलाडीला) जिला-दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़ में अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन 13 जून 2019 को सशर्त 15 दिनों के लिए स्थगित किया गया। कल दिनांक से ही फर्जी ग्राम सभा की दंडाधिकारी जांच आदिवासियों की गठित समिति के देखरेख में प्रारंभ हो चुकी है।समिति ने आंदोलन के दौरान आंदोलित आदिवासियों को बस्तर सहित सम्पूर्ण देश से विभिन्न आदिवासी संगठनों, कमर्चारी/अधिकारी, किसान/मजदूर(एसटी/एससी/ओबीसी/अल्पसंख्यक) द्वारा आर्थिक, वैचारिक सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया है तथा आंदोलन को देशव्यापी आंदोलन का रुप देने में सोशल मीडिया की भूमिका की सराहना की है इसके अलावा विभिन्न टीवी चैनल्स, न्यूज पेपर, वेब पोर्टल न्यूज के साथियों को भी सादर जोहार/ आभार व्यक्त किया है। और आश्वस्त किया है कि यह आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है, जब तक की हम लीज आबंटन को रद्द ना करा दें।

0 0
0 %
Happy
0 %
Sad
0 %
Excited
0 %
Angry
0 %
Surprise