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महाधिवक्ता कनक तिवारी को हटाने पर चौतरफा घिरी छत्तीसगढ़ कांग्रेस सरकार

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खबरी चिड़िया @ रायपुर महाअधिवक्ता कनक तिवारी को बिना त्यागपत्र लिए हटाये जाने को लेकर कांग्रेस सरकार अब बूरी तरह घिरती नजर आ रही है । पहले ही हड़बड़ी में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल टीवी चैनलों को झूठा बाईट देकर फंस चुके हैं , कल देर शाम कानून मंत्री मो अकबर से भी अद्भुत बयान दिलवाया गया कि महाअधिवक्ता द्वारा काम मे दिक्कत का पत्र को सरकार ने त्यागपत्र समझ लिया ।

पर जब बात इससे भी नही बनी तो आज सुबह से एक नया खेल खेला गया । कुछ न्यूज पोर्टल में बिना किसी श्रोत के हवाले से एक जैसा बना बनाया समाचार प्रसारित कराया गया , जिसमे कनक तिवारी को हटाए जाने के पीछे संवैधनिक संकट की कहानी गढ़ी गई है , कहा गया है कि महाअधिवक्ता ने बिना सरकार की जानकारी के यह संकट खुद पैदा किया और इस तरह से सरकार की ओर से बिना कहे ये न्यूज पोर्टलों ने सफाई दिया कि उनके स्तीफा देने या नही देने से भी कोई फर्क नही पड़ता ।

पहले जानिए कि कनक तिवारी पर आरोप क्या लगाया गया है । इन खबरों में बताया गया है कि कनक तिवारी ने अपने क्रियाकलापों से सरकार के लिए गंभीर संकट और संवैधानिक संकट खड़ा किया था। तृप्ति राव नमक अधिवक्ता ने कनक तिवारी के ऊपर संवैधानिक पद की मर्यादा के खिलाफ शासकीय अधिवक्ता नियुक्ति को लेकर याचिका प्रस्तुत की थी। जिसमें कनक तिवारी व्यक्तिगत रूप से पार्टी बनाए गए थे।। बिना किसी के उल्लेख के आगे कहा गया है कि मामले की संजीदगी को देखते हुए HC ने कनक तिवारी के द्वारा पारित किए गए आदेश की प्रति भी हाईकोर्ट में तलब कर लिया था। इस मामले में कथित रूप से कनक तिवारी ने बिना राज्य शासन को सूचना दिए अतिरिक्त महाधिवक्ता फोजिया मिर्जा को इस मामले में उपस्थित करवाया था। कहा गया है कि जब इस का राज्य शासन को पता चला तो… सारे मामले की पड़ताल की गई और यह तथ्य सामने आया कि कनक तिवारी ने विधि विरुद्ध तरीके से आदेश पारित किए हैं। जिससे सरकार के लिए गंभीर संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया। ऐसी परिस्थितियों में तथा प्रकरण के तथ्यों को देखते हुए कनक तिवारी को कोर्ट के समझ खड़ा कर दिया । आगे फिर से दुहराया गया है कि कनक तिवारी के संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ क्रियाकलाप ने उनको न्यायालय के समक्ष कर दिया था। उसेसे सरकार को संवैधानिक संकट का सामना करना पड़ रहा था। और सरकार के लिए यह दुविधा पूर्ण था कि वह किस रूप में इस मामले को समाप्त करें।

इस आरोप के सम्बंध में हमने जब विद्वान अधिवक्ता कनक तिवारी से बात तो उन्होंने इस आरोप को मूर्खता पूर्वक बताते हुए कहा कि – ” सरकार द्वारा निर्मित लॉ मैनुअल में एडवोकेट जनरल को पूरी शक्तियां हैं सरकार का पक्ष रखने के लिए। एडवोकेट जनरल को संविधान में शक्ति है। वही तय करेगा कि किस प्रकरण में कौन अधिवक्ता खड़ा हो और शासन की ओर से कौन पक्ष समर्थन करे। इस संबंध में शासन या विधि सचिव द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता । ऐसा लॉ मैनुअल में लिखा है। जो सरकार ने खुद बनाया है। 

कनक तिवारी जी ने कहा है कि सरकार के अधिकारी अपनी गलतियां छुपा रहे हैं इसके बावजूद यह छोटी सी बिना मतलब की घटना इस्तीफे से कहां जुड़ती है । इसके कारण किस ने इस्तीफा दिया है । बहुत छोटी सी एक घटना को तिल का ताड़ बनाने की कोशिश है ।महाधिवक्ता को पैनल लॉयर के काम में समय-समय पर निरीक्षण करने और उस पर आवश्यक निर्देश देने का अधिकार है ।महाधिवक्ता अपने कार्यालय के विभागाध्यक्ष भी होते हैं। इस प्रकरण में 8 वकीलों के संबंध में यह शिकायत ऑफिस से मिलने पर कि वे अपने कार्य में रुचि नहीं ले रहे हैं । मुश्किल से 15 दिनों के लिए उनको काम देने से रोका गया। सूची से पृथक नहीं किया गया ।उन्होंने अपनी गलती मानी और 15 दिन बाद सबको कार्य देना शुरू कर दिया गया ।वह पैनल लॉयर हैं। सरकार के द्वारा अधिकृत शासकीय अधिवक्ता की श्रेणी में नहीं हैं। 8 में से 7 वकीलों ने काम करना शुरू कर दिया ।अभी कर रहे हैं ।केवल एक अधिवक्ता को नाराजगी थी ।

एडवोकेट जनरल द्वारा काम देना शुरू करने के बाद लगभग डेढ़ महीने बाद भड़काये जाने पर उन्होंने याचिका प्रस्तुत की। उसमें एडवोकेट जनरल को निजी नाम से भी पक्षकार बनाया गया। शासन को औपचारिक रूप से बनाया जाता है । इस संबंध में लॉ मैनुअल के हिसाब से किसी भी प्रकरण में केवल एडवोकेट जनरल को ही अधिकार है अन्य किसी अधिवक्ता को नहीं है । उन्होंने हस्तक्षेप करने की कोशिश की जो गलत है और हाईकोर्ट ने केवल इतना मांगा कि जिस आदेश के द्वारा पहला आदेश निरस्त कर दिया है और काम देना शुरू कर दिया उसे कोर्ट में पेश कर दें । इस संबंध में और कोई जानकारी नहीं लेनी थी। विधि सचिव ने हस्तक्षेप किया और सतीश वर्मा को मौखिक रूप से कहा कि वे खड़े हो जाएं । उनके कारण लेकिन दोनों पक्षों की आपस की अंदरूनी सांठगांठ से अभी तिथि केवल बढ़ा दी गई है ।

“इसमें कहीं कोई संवैधानिक संकट नहीं उत्पन्न हुआ है । मैं इसे मौखिक तथा दस्तावेजी रूप से स्पष्ट करूंगा। मेरे पास आवाज का रिकार्ड भी है। सुनेंगे तो बड़बोले सज्जन शर्म करेंगे। उक्त याचिका में केवल इतना मांगा गया है कि एडवोकेट जनरल ने जो काम रोकने का आदेश दिया था 28 फरवरी को उसे निरस्त किया जाए । वह आदेश एडवोकेट जनरल ने खुद ही 13 मार्च को निरस्त कर दिया ।ऐसी स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत याचिका बनती ही नहीं है। इसका निराकरण न्यायालय में बहुत आसानी से हो जाएगा। इसके पहले भी एडवोकेट जनरल पैनल लॉयर्स को काम देते और रोकते रहे हैं ।उनके नाम हटाते भी रहे हैं ।तब कभी ऐसी स्थिति नहीं आई क्योंकि उस समय विघ्न संतोषी नहीं थे। दो एडवोकेट जनरल इसी हाई कोर्ट के न्यायाधीश हैं। इस संबंध में यह है की पैनल लॉयर्स को रोज की उपस्थिति में चाहे कितने भी मुकदमे करें केवल 15 सौ रुपए रोज का भुगतान होता है ।उनको शासकीय अधिवक्ताओं की तरह कानूनी अधिकार नहीं होते ।कभी भी रखा जा सकता है कभी भी अलग किया जा सकता है। जिसे विवेक के आधार पर रखा हटाया जा सकता है उनके अधिकारों के लिए अनुच्छेद 226 में कोई याचिका नहीं बनती है। यह भी है कि कभी कभी काम का बंटवारा इस तरह हो जाता है कि पैनल लायर्स को कभी कभी किसी दिन काम नहीं मिलता है इससे भी उनके अधिकार खंडित नहीं होते हैं।”

साभार: भूमकाल समाचार

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