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आज भी यकीन नहीं होता नरेन्द्र बंसोड़ नहीं रहे

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उत्तम कुमार (सम्पादक दक्षिण कोसल) @ खबरी चिड़िया सबको मुक्कमल जहां नहीं मिलता। यह उनका पसंदीदा गीत था जिसे वे मेरे लिए मुहावरे के रूप में उपयोग में लाते थे। इन तीन सालों में पता ही नहीं चला उनकी भौतिक काया हमारे बीच नहीं हैं लेकिन तर्क, विचार और आंदोलन में वे हमेशा हमारे साथ रहे। व्यक्ति के देहांत के बाद सभी उनकी अच्छाइयों और बुराइयों पर बहस करते हैं लेकिन मृत व्यक्ति के महत्वपूर्ण कार्यों पर बातें कम होती है। कोई भी व्यक्ति सम्पूर्ण नहीं होता है सभी के जीवन में कमजोरियों और अच्छाइयों का फैंटसी होता है। कई बार कार्य की लकीरें कमजोरियों को बड़ा कर देता है और तो कभी कार्य बढ़ा हो जाता है। कार्य और कमजोरियों के बीच एक महीन दार्शनिक संबंध होता है। उन्होंने नई जहां की तलाश में आंबेडकरी सोच को अपने और अपने समाज के लिए मुक्ति का मार्ग चुना था। लोगों से दोस्ती और बुरे वक्त में साथ देना कोई उनसे सीखे। वाकपटुता और व्याख्यान शैली के लिए वे खाशे जाने जाते थे।

तारीख 15 फरवरी 1968 को राजनांदगांव के बसंतपुर में दलित परिवार में जन्मे नरेन्द्र ने कई सारे विविधताओं और प्रतिभाओं को मानो एक साथ लेकर जन्मा था। पिताजी भैयालाल बंसोड़ और माता जैनाबाई बंसोड़ के चौथे पुत्र घर में अपनी प्राथमिक पढ़ाई के साथ पिता के बढ़ई के कामकाज में हाथ बटाते थे। बढ़ईगिरी करते करते पिता के द्वारा घुट्टी में पिलाए गए दलित आंदोलन और डॉ. आंंबेडकर के विचारधारा के करीब आए और जाने माने दलित नेता तक का सफर पूरा किया। इस बीच उनकी पढ़ाई भी चलती रही और 49 वर्षीय नरेन्द्र बाबा साहेब के नक्शे कदम पर चलते हुए कानून की पढ़ाई पूरी कर अधिवक्ता सह जननेता बन गए। आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने के कारण उन्हें नक्सली अधिवक्ता कहा जाता था। कहा जाता है कि उनके पिता और उनके मित्र बीडी सुखदेवे, अवधराम वर्मा राजनांदगांव के कट्टर आम्बेडकरी थे। बामसेफ से जुड़े जीडी राउत ने उनके अंदर एक सामाजिक कार्यकर्ता की भविष्य देखी थी। राऊत कहते हैं कि उनका जीवन किसी भी व्यक्ति को प्रभावित करनेवाला था। साल 1986-87 में कॉलेज चुनाव लड़ने वाले पतले दुबले लेकिन साधारण शक्ल सूरत का यह युवक साल 1987 में राजनांदगांव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के फाउंडर माने जाते हैं। पार्टी के प्रचार-प्रसार के लिए दिवाल लेखन से लेकर 2003 में बीपी मेश्राम को विधान सभा चुनाव में उतारने और उनके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करने के लिए चुनाव संचालक के कार्यभार को बखूबी निभाया था। इस चुनाव के दौरान समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा यह अफवाह उड़ाया गया था कि मेश्राम 7 लाख से ज्यादा रुपए लेकर बैठ गए हैं। ऐसे अफवाहों के बीच भी वे पार्टी के लिए मजबूती के साथ खड़े रहे। साल 1991-92 में जब कांशीराम की साइकिल रैली जब पूरे देशभर में चल रही थी उस वक्त छत्तीसगढ़ की राजनैतिक फिजां को बदलने में उन्होंने ठोस जमीन तैयार की।

इस दौरान वे राजनीति के रास्ते सत्ता तक पहुंचने में चुनाव प्रचार के लिए तन-मन और धन से जुट गए। उनके द्वारा तैयार किए गए कार्यकर्ताओं में सतीश पांड्या आज अपने वार्ड गौरी नगर में पत्नी को पार्षद के रूप में जिताने में सफल साबित हुए। 29 अप्रैल 2006 में पविता राऊत से विवाह सूत्र में बंधने के बाद राजनीति में सक्रिय हो गए। 19 नवम्बर 2009 में प्रथम राजनैतिक गुरू और पिता भैया लाल बन्सोड़ के निधन के बाद उन पर घर-परिवार और संगठन की जिम्मेदारी पहाड़ की तरह आ टूटी लेकिन जिस तेजी के साथ साल 2007 में नई आंबेडकरी संघ (एम्बस-ऑल इंडिया मूल निवासी बहुजन समाज सेन्ट्रल संघ) और पार्टी एपीआई (आंंबेडकराईट पार्टी ऑफ इंडिया) का नींव रखा था यह तारीफेकाबिल है। उनका मानना था कि इस संघ और पार्टी का घोषणा पत्र, नीति और व्यापक कार्यक्रम है। वे ताउम्र इस संघ और पार्टी को स्थापित करने के कार्य में निर्विवाद जुटे रहे। मार्के की बात यह रही कि जिन लोगों को उन्होंने बसपा के लिए जोड़ा था, सतीश पांड्या, प्रशांत सुखदेवे, ललित साहू, महेन्द्र वर्मा, रज्जाब खान, गेंदसिंह जगत जैसे जुझारू कार्यकर्ताओं को संघ एंबस और एपीआई के साथ कभी नहीं जोड़ पाए। रज्जाब और गेंदसिंह ने बताया कि साल 2000 में गंडई नगर पंचायत चुनाव में बसपा से आठ प्रत्याशियों को टिकट दिया था। इस टिकट वितरण के लिए जिला संयोजक के रूप में बसपा में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

नरेन्द्र के बताए महत्वपूर्ण कदम जो उन्हें प्रदेश सहित देश में स्थापित करता है। उन्होंने दलितों से जुड़े सारे आंदोलन का नेतृत्व किया। अपने ही समाज में जाति प्रमाण पत्र का मामला, आरक्षण को बचाए रखने, संविधान की रक्षा, बौद्ध धर्म में धर्मान्तर, भंतों को कैसा होना चाहिए, खंडित मूर्तियों की पुर्नस्थापना संघर्ष, अखबार में दलितों के खिलाफ उभरते द्वेष का खंडन और टिप्पणियां, कविता, गीत और लेखों का प्रकाशन, बाबा साहब, बिरसा मुंडा, बौद्ध साहित्य के साथ विशेषकर नंद कुमार बघेल की पुस्तक ‘ब्राह्मण कुमार रावण को मत मारो’ और सतनाम समाज से जुड़े पत्र पत्रिकाओं के प्रचार प्रसार का कार्य भी किया। दक्षिण कोसल पत्रिका के सलाहकार संपादक के पद से हटने के बाद भी पत्रिका के लिए प्रूफ का कार्य अपने बीमारी की अवस्था में भी करते रहे। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वे राजनांदगांव के साथ पूरे भारत को प्रबुद्ध भारत में बदल सके। उनकी अनुपस्थिति में संघ एम्बस से जुड़ी पार्टी जिसके टिकट पर साल 2014 लोकसभा चुनाव में लगभग 14 हजार वोट लाएं। सारे कार्य उनके कुशाग्र नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। ऐसे संघ और पार्टी के निर्माण से लेकर छत्तीसगढ़ में कापसी, पखांजूर, भानुप्रतापुर, कांकेर, बस्तर, जगदलपुर, भोपालपतनम, कवर्धा, छुईखदान, खैरागढ़, राजनांदगांव, मानपुर, मोहला, अंबागढ़ चौकी, दुर्ग, भिलाई, रायपुर, महासमुंद, सरायपाली, बसना सहित अन्य राज्यों उड़ीसा, महाराष्ट्र में आंबेडकरवाद को स्थापित करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है।

आरक्षण और आंबेडकर पर जब ‘नांदगांव टाईम्स’ के तंगदिमाग संपादक अशोक पांडे ने दलितों को दिग्भ्रमित करने वाला संपादकीय लिखा तो उसका मुंहतोड़ और माकूल जवाब भी दिया गया। बसपा के गिरते राजनीतिक स्थिति को भांप कर एम्बस और एपीआई में भागीदारी की बेहतर विकल्प दलित, आदिवासियों और पिछड़ों व अल्पसंख्यकों को दे सके। और जब भी मौका मिला अपने संघ व पार्टी में निहित गलतियों को सुधारा। उनके महत्वपूर्ण कार्यों में अंतागढ़ उपचुनाव साल 2013 में उनकी कार्यक्षमता से सभी प्रभावित रहे। भगवागढ़ छत्तीसगढ़ में ब्राह्मणी ऊंच नीच की व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए अंबागढ़ चौकी में 5 हजार दलितों को बौद्ध धर्म में धर्मान्तरित किए। ये कुछ गिने चुने कार्य है जिन्हें ऊंगलियों में नहीं इतिहास में दर्ज कर लिए गए हैं, जिसे महत्वपूर्ण विचारधारात्मक कार्यों में गिना जाता है। 26 अगस्त 1992 को अखबार के संपादक पांडे ने अपनी सम्पादकीय ‘जाति पर आधारित जनगणना’ में लिखा था कि -‘वे जाति आधारित आरक्षण की निंदा करते हैं। वे लिखते हैं कि अंबेडकर आर्थिक आधार के पक्षपाति रहे हैं। आज आरक्षण के कारण जो विस्फोटक स्थिति निर्मित हुई है। उसका सारा दोष अम्बेडकर जैसे तुच्छ जयचन्दों को जाता है। जिन्होंने अपने को महान सिद्ध करने ऐसे जलिल हरकत की है।

जिसके लिए राष्ट्र के समझदार और गरीब लोग उन्हें हमेशा गालिया देते रहेंगे, और सदैव उन्हें कोसते रहेंगे क्योंकि कोई नाथुराम उस समय ऐसे दलितों के दलाल के लिए पैदा नहीं हुए जो उन्हें उनकी काली करतूत के लिए सजाए मौत दे सकता। आज शताब्दी समारोह और भारत रत्न की चकाचौंध में भले ही उन्हें महानता का खिताब दे रहे हो पर वह कभी इसके काबिल नहीं रहा।’ इस बौधिक दिवालिया से युक्त अधकचरा और जातीय विष उगलता सम्पादकीय का विरोध अगर किसी ने किया तो व नरेन्द्र का नेतृत्व ही था। इस सम्पादकीय के बाद उनके नेतृत्व में बौद्ध अनुयायियों ने राजनांदगांव के जयस्तंभ में धरना प्रदर्शन कर उक्त पत्रिका के सम्पादक को माफी मांगने मजबूर किया।वर्ष 1995 को अपने गठबंधन की सरकार को गिराकर बीएसपी ने भारतीय जनता पार्टी जैसी ब्राह्मणवादी पार्टी से समझौता कर डाला था जिसकी वजह से मायावती तीन बार क्रमश: चार, छह तथा 14 माह तक उत्तरप्रदेश की सत्ता में रही, बाकी सात साल बीजेपी का शासन रहा। इस तरह पहली बार दलित आंदोलन अपने सबसे बड़े दुश्मन यानी संघ परिवार का शिकार हो गया। इस घटना के बाद नरेन्द्र बन्सोड़ ने विश्लेषण करते हुए कहा था कि बसपा के प्रमुख मायावती की राजनैतिक हत्या हो गई है। इस बयान के बाद उन्हें तीखे आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। तीखे आलोचनाओं के बाद इस बयान को न वापस लिए और न ही किसी प्रकार का खंडन ही किया और वर्तमान में मायावती और बसपा की स्थिति उनके उस समय के भविष्यवाणी से जोड़कर आज समझा जा सकता है। उनकी विद्वता व गहराई को आज बसपा के ढहते गढ़ के तौर पर साफ देख रहे हैं कि नरेन्द्र की राजनीतिक समझ गहरी थी।

उनका भविष्यवाणी 2007 के आते-आते सच होने लगा। दलित आंदोलन का सदियों पुराना ब्राह्मणवाद विरोधी अभियान ब्राह्मण सहयोग में बदल गया, विशेष रूप से मायावती ने डॉ. आंबेडकर की एक उक्ति को गलत संदर्भों में बड़े पैमाने पर उद्धृत करना शुरू कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि सत्ता हर ताले की मास्टर चाभी होती है, अत: जातिव्यवस्था विरोधी संपूर्ण ऐतिहासिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि को लात मार कर मायावती ने ब्राह्मणों के साथ अन्य सवर्ण जातियों को प्रभावित करने के लिए इस कड़ी में अलग-अलग जातियों के सम्मेलन आयोजित करवाने के साथ-साथ आर्थिक आधार पर नौकरियों में आरक्षण का वादा करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप भारतीय राजनीति में बड़े पैमाने पर जातीय चेतना का विकास होने लगा। दलित आरक्षण की अवधारणा हिंदू धर्म की शिकार जातियों के शोषण पर विकसित हुई थी। डॉ. अंबेडकर के सपने को मायावती ने चकनाचूर कर दिया। मतभेदों ने कभी उनका पिछा नहीं छोड़ा, उन्होंने सही आम्बेडकरी विचारधारा और दर्शन को समाज में कैसे लागू करे, इसपर व्यवहारिक कार्य किए थे। समाज में एकता कैसे स्थापित हो इसकी उन्हें चिंता थी।

इस संदर्भ में उनका अंतिम पत्र खासा प्रकाश डालता है। उन्होंने अपने अंतिम पत्र में लिखा हैं कि -‘मैं समझता हूं दुनिया में एम्बस के प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र संघ वर्ष 2016 को डॉ. आम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय वर्ष भी घोषित कर सकता है। और यह दिन अंतरराष्ट्रीय ‘ज्ञान दिवस’ के रूप में सच साबित हुआ। स्वयं पर लगे आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा था कि राजनांदगांव शहर में बाबा साहब आम्बेडकर की जयंती पहली बार कब मनाई गई उसकी मुझे जानकारी तो नहीं है परन्तु मैं जानता हूं कि पूर्व में इस शहर के बौद्ध अनुयायी पूरे जोश खरोश के साथ एक ही मंच पर एक ही संगठन के बैनर तले बाबा साहब की जयंती मनाया करते थे और सामाजिक आंदोलन के साथ बुद्ध और बाबा साहब के व्यक्तित्व, कृतत्व और उनके आंदोलन को समझने का प्रयास करते थे और उक्त आयोजन में गैर राजकीय व्यक्तित्व चाहे वह नंदूलाल चोटिया हो चाहे डॉ. खरे हो, नागपुर के मजदूर नेता नगरारे हो, भन्ते भदन्त आनन्द कौशल्यायन हो, डॉ. काम्बले हो या फिर शरद कोठारी हो जैसे विद्वान लोग वक्ता होते थे।’

उन्होंने अपने पत्र में आगे लिखते हैं कि हम बौद्धों से ही राजनांदगांव के दूसरे समाज व धर्मों के लोगों ने जुलूस निकालना प्रारंभ किया बौद्ध समाज इनका प्रेरणा स्त्रोत हैं इस समाज के लोगों ने अपना सामाजिक विभाजन खत्म कर अपनी एकता प्रस्थापित की किन्तु हम वर्तमान में विभाजित हो गए हैं मेरे लिए ही नहीं समाज के बहुसंख्यक अवाम के लिए भी दुख व चिंता का विषय है। बाबा साहेब के 125वीं जयंती पर उनकी इच्छा थी कि यह आयोजन राजनांदगांव के लिए ऐतिहासिक हो उन्होंने पत्र में लिखा था कि लोकतंत्र में मतभेद का होना संभव है लेकिन एक समाज, एक विचारधारा, एक महापुरूष और एक संगठन के बैनर पर कार्य करने वालों को आपस में मनभेद, द्वेषभाव नहीं रखना चाहिए और जब पूरी दुनिया बाबा साहब की 125वीं जयंती मनाने जा रही है तब उनके अनुयायी अपने मतभेद भूलाकर जयंती का एक आयोजन क्यों नहीं कर सकते है। हो सकता है हमारा एकीकरण और हमारा आयोजन भी रिकॉर्ड बनाए व उक्त आयोजन ऐतिहासिक हो। वार्डों और शाखा समितियों का चुनाव हो और उसके बाद बौद्ध कल्याण समिति की केन्द्रीय ईकाई का चुनाव हो और उसमें समाज का कोई भी विद्वान, प्रबुद्ध एवं कुशल नेतृत्व का धनी व्यक्ति अपना निर्वाचित हो या मनोनित हो। और इससे हमारे समाज की राजनांदगांव शहर में खोई हुई प्रतिष्ठा पुन: वापस प्राप्त होगी तथा हमारा समाज पुन: अन्य समाजों के लिए प्रेरणास्त्रोत बनेगा।

उनकी इच्छा थी की राजनांदगांव के बौद्ध अनुयायी एकजुट रहे। चलिए नरेन्द्र के दिखाए राह के बहाने बाबा साहेब अम्बेडकर के मार्ग पर चले। तमाम मतभेदों व आरोपों के बाद कुछ कार्य जो अधूरे रह गए उसे पूरा करना आज भी बाकी है। कोई काम किसी के कारण रूकता तो नहीं है लेकिन ऐसे व्यक्ति भी समाज में दुबारा नहीं आते, सही कहा जाए तो एक सही आंबेडकरी विचारक और सक्रिय जमीनी कार्यकर्ता अब नहीं रहा। आज भी जो लोग उनको जानते हैं उनकी आंखें उन्हें सभाओं, आंदोलनों व मंचों में उन्हें ढूंढ़ती हैं।
गरीब तबके के लोग खासकर अपनी पैरवी के लिए उनको अन्य वकीलों में देखने की भूल कर बैठते हैं। उनका हमारे बीच नहीं रहने के बाद भी काम रूका नहीं है कार्य और भी तेजी के साथ बड़ा है लेकिन आंदोलनों को सुपर जनरेटर की तरह ऑपरेट करने वाला कई सौ में से एक सितारा 29 जून 2016 को हमें अलविदा कहते हुए तमिलनाडु के वेल्लोर स्थित सीएमसी अस्पताल में ‘ब्लड कैंसर’ जैसे खतरनाक बीमारी से जूझते हुए अंतिम सांसें ली। लेकिन उनके विचार और कार्यक्षमता आज भी उनके अनुयायियों को मार्गदर्शन और संबल देता है और ऐसे समय पर जब पूरे देश में फासीवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद नंगा नाच कर रहा है, जिसके वे दुश्मन थे वैसे वक्त में समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व न्याय और मानवतावाद के पहरियों को क्षति तो पहुंचा है, जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा।

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