बस्तर

बस्तर में आदिवासियों ने मनाया विश्व का सबसे अनोखा जन्माष्टमी उत्सव


जोगेश्वर नाग @ बारसूर देश में जन्माष्टमी का उत्सव इस बार भी धूमधाम से मनाया गया। लेकिन बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिला अंतर्गत हिरानार गाँव का जन्माष्टमी का उत्सव पूरे विश्व में सबसे अनोखा है।

जन्माष्टमी के त्यौहार में आदिवासी अपनी परंपरागत ढोल की थाप पर नृत्य करते नजर आए। ढोल नृत्य की खूबी थी कि इसमें नौजवान से लेकर बूढ़े तक नृत्य करते हुए नजर आए। हिरानार गाँव का यह नजारा ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे ढोल की थाप पर राधा कृष्ण की शादी आयोजित की गई हो। हिरानार में दही मटकी को मानव पिरामिड बनाकर एक दूसरे के ऊपर चढ़कर तोड़ा गया।

जन्माष्टमी का उत्सव श्रीकृष्ण के जन्म और उनकी शरारतों को याद कर मनाया जाता है। इससे जुड़ी कहानी यह है कि भगवान कृष्ण का जन्म भाद्र मास की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में माता देवकी की कोख से कृष्‍णजी का जन्‍म हुआ। कंस ने देवकी को उनके पति वासुदेव समेत कारागार में डाल रखा था। यह आकाशवाणी पहले ही हो चुकी थी कि देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान कंस की मौत का कारण बनेगी। लेकिन कंस देवकी की सभी संतानों को एक के बाद एक मारता जा रहा था। जब आठवीं संतान कृष्‍ण के रूप में हुई तो वासुदेव ने किसी तरह उन्‍हें सुरक्षित गोकुल में यशोदा और नंद के घर पहुंचा दिया। बस फिर यहीं पर गोपाल की बाल लीलाओं का आरंभ हुआ।

बचपन में कृष्‍ण को दही और मक्‍खन अतिप्रिय था। वह अक्‍सर गोपियों की मटकियों से माखन चुराकर खाया करते थे। गोपियां उनसे परेशान होकर यशोदा मैय्या से उनकी शिकायत किया करती थीं। गोपियां कन्‍हैया से अपना दही मक्‍खन बचाने के लिए मटकियों और हांडियों को ऊंचाई पर टांग देती थीं। लेकिन कान्‍हाजी चतुराई से दोस्‍तों के ऊपर चढ़कर मटकी में से दही और मक्‍खन चुरा लेते थे। कई बार वह शरारत में दही से भरी मटकियां फोड़ भी देते थे। कृष्‍ण की इन नटखट शरारत से भरी बाल लीलाओं को याद करते हुए दही हांडी का उत्‍सव मनाया जाता है। हिरानार में भी दही हांडी का उत्सव मनाया गया। लेकिन ढोल की थाप पर नृत्य का आयोजन कृष्णलीलाओं की इस त्यौहार में चार चाँद लगा गया।

मटका फोड़ और नृत्य के इस कार्यक्रम में पुरस्कार भी रखा गया था। जिसमें नृत्य पर प्रथम 5000 और द्वितीय 2000 रुपये नगद दिया गया। वहीं दही हांडी फोड़ने वाले विजेताओं को ₹35000 का पुरस्कार दिया गया।

कार्यक्रम को सफल बनाने में देवेन्द्र नाथ कश्यप, महादेव लेकामी, पीसे वट्टी, एस.आर. कड़ती, मासा राम लेकामी, बलिराम नेताम, बलदेव कश्यप, लूदरु राम नाग, रामलाल नेताम, बोमड़ा राम कश्यप, सुशील नेताम, बालसिंह कोरसा, कुम्मा राम वेक, मड्डाराम वेक, बिंदुराम कश्यप आदि सदस्यों का विशेष योगदान है।

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