बस्तर

सरकारें नहीं, मांझीडिह की प्यास बुझायेगा उनका अपना नाले में बनाया झिरिया

पानी के लिए शासन-प्रशासन से लगाई गुहार, नहीं हुआ समाधान तो गांव में सूखे नाले में बना दिये आधा दर्जन झिरीया, अब इसी से बूझती है इंसानों और मवेशियों की प्यास…

सलीम शेख @ खबरी चिड़िया सुकमा आजादी के सत्तर साल बाद भी देश के ग्रामीण इलाकों में पानी जैसी मूलभूत सुविधा नहीं मिल पा रही है। दुर्भाग्य कहे या फिर विडंबना, पेयजल व्यवस्था के नाम पर करोड़ों रूपये मिलने के बाद भी पानी के लिए ग्रामीणों को जददोजहद करनी पड़ रही है। सुबह से शाम तक ग्रामीण पानी के इंतेजाम में दिन गुजार रहे हैं। पानी के लिए शासन-प्रशासन से कई बार गुहार लगाने के बाद भी जब समस्या का हल नहीं निकला, तो ग्रामीणों ने गांव के पास बहने वाले नाले में आधा दर्जन से ज्यादा झिरिया बनाकर पेयजल की व्यवस्था कर ली। अब इसी से ग्रामीणों और मवेशियों की प्यास बूझ रही है।

हम बात कर रहे हैं सुकमा जिले के छिंदगढ़ विकासखण्ड के कोडरीपाल पंचायत अंतर्गत मांझीडिह गांव की। यहां विकास के नाम पर केवल हैण्डपंप हैं, जिससे आयरनयुक्त पानी ही निकलता है। यहां के ग्रामीण बूंद-बूंद पानी बचाकर जैसे-तैसे जीवन काट रहे हैं। करीब 75 घरों वाला यह गांव गर्मियों में आदिम युग में जीने को मजबूर हो जाता है। गांव से लगकर बहने वाला गुरती नाला में ग्रामीणों ने जगह-जगह झिरिया बनाकर पेयजल की व्यवस्था की है।

बारिश के लिए अभी से इंतज़ाम में लगे ग्रामीण…
गांव के हालात ऐसे हैं कि ग्रामीणों ने अभी से बारिश में पेयजल की किल्लत न हो इसिलिए नाले में स्थाई रूप से रिंग लगाकर छोटा से कुंआ बना लिया है। ग्रामीणों के अनुसार पानी, सड़क और स्वास्थ्य को लेकर कई बार नेताओं और अफसरों से दरख्वास्त कर चुके हैं। आश्वान के अलावा उन्हें कुछ नहीं मिला। आज भी पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए जंग लड़ना पड़ रहा है। गांव में चार हैंण्डपंप जरूर है लेकिन एक से भी पानी पीने योग्य नहीं निकलता है। आयरनयुक्त पानी होने की वजह से ग्रामीण संक्रमित बीमारियोंं की चपेट में आ रहे हैं।

क्या भाजपा, क्या कांग्रेस, चुनाव के बाद सब भूल जाते हैं…
ग्रामीण तुलसी बघेल का कहना है कि शासन-प्रशासन में बैठे जिम्मेदारों को ग्रामीण इलाकों की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है। चुनाव के दौरान प्रचार में आने वाले नेता भी बड़े-बड़े वादे कर जाते हैं लेकिन जीतने के बाद गांव की ओर मुड़कर नहीं देखते। पांच साल बीत जाने के बाद फिर वहीं नेता नये वादों के साथ गांव पहुंचते हैं। तुलसी बघेल बताते हैं कि पिछली बार उन्होनें भाजपा को वोट दिया था और इस बार कांग्रेस के दीपक बैज को वोट दिया है। 6 माह बीत चुके हैं गांव में न तो नेता आया और न ही कोई अधिकारी।

गांव तक पहुचने के लिए सड़क नहीं…
छिंदगढ़ विकासखण्ड के मांझीडिह गांव तक पहुंचने के लिए आज भी सड़क नहीं है। पगडंडियों के सहारे ही यहां तक पहुंचा जा सकता है। ग्रामीण डुंडका राम बघेल बताते हैं कि स्वास्थ्य सेवा के लिए गांव में कोई सुविधा नहीं है। गांव से करीब 8 किमी दूर तोंंगपाल पर वे निर्भर हैं। सर्दी खांसी व वायरल बीमारियों के लिए भी ग्रामीणों को 8 किमी जाने के बाद ही सुविधा मिल पाती है। रात में यदि आपातकालिन स्थिति में मरीज को स्वास्थ्य केन्द्र तक ले जाना मुश्किल हो जाता है। सड़क की सुविधा नहीं होने से गांव तक एंबुलेंस भी नहीं पहुंच पाती है। दुपहिया या फिर सायकल में लादकर मरीज को अस्पताल पहुचाना पड़ता है।

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