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आदिवासियों की हत्यारी सरकार के खिलाफ छत्तीसगढ़ में चुनौतीपूर्ण पत्रकारिता करने वाले संतोष यादव को रमणिका सम्मान

खबरी चिड़िया @ हैदराबाद रमणिका गुप्ता फाउंडेशन, जिसे आदिवासी अनुसंधान और विकास केंद्र (सीएआरडी) द्वारा प्रबंधित किया जाता है। आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच (एएआरएम) की शोध शाखा हर साल एक पुरस्कार नवोदित क्षमतावान आदिवासी लेखक / स्तंभकार को उनके जनपक्ष पत्रकारिता के लिए सम्मानित करती है जो साहसिक और असाधारण काम करता है। बस्तर के निर्भीक पत्रकार संतोष यादव को पुरस्कार के रूप में एक प्रशस्ति पत्र और रु 25,000 (रुपए पच्चीस हजार) नकद राशि प्रदान की गई है।

इस वर्ष रमणिका गुप्ता फाउंडेशन ने श्री संतोष यादव (33), एक संवेदनशील नवोदित स्तंभकार, साहसिक लेखक और छत्तीसगढ़ के मानव अधिकार कार्यकर्ता को पुरस्कार प्रदान करने के लिए चुना है। श्री यादव ने 2011 में अपने करियर की शुरुआत छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से प्रकाशित नवभारत पत्र में स्थानीय पत्रकार के रूप में की थी। उनके पत्रकारिता जीवन में आदिवासियों के जीवन और संघर्षों पर कई समाचार प्रकाशित किए गए हैं। हाशिए पर खड़े आदिवासियों के कल्याण के लिए सरकार की उदासीनता और नक्सलियों से मुकाबला करने के नाम पर छत्तीसगढ़ में निर्दोष आदिवासियों पर अत्याचार भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा करने में संतोष यादव की पत्रकारिता का बड़ा योगदान माना जाता है।

बस्तर के पत्रकार संतोष यादव की खबरों का ही असर था कि छत्तीसगढ़ की तत्कालीन भाजपा सरकार की भूमिका पर राष्ट्रीय स्तर पर भारी बहस छिड़ गई थी। उस समय, एक सबसे दागी IPS अधिकारी शिव राम प्रसाद कल्लूरी बस्तर क्षेत्र में पुलिस महानिरीक्षक के रूप में तैनात थे। 2015 में, श्री संतोष यादव को आईपीसी की धारा 302 और 307 के तहत 2 वर्षों से अधिक समय के लिए जेल में घसीटा गया।

संतोष यादव पर छत्तीसगढ़ सुरक्षा अधिनियम की धारा 29 के तहत भी फंसाया गया। इस एक दंडनीय अधिनियम में फंसाने के बाद पत्रकार संतोष यादव के साथ थाने से लेकर जेल तक शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनके परिवार के सदस्यों को भी इस क्रूर उत्पीड़न और आर्थिक नाकेबंदी से गुजरना पड़ा था। श्री संतोष यादव ने 2017 में सुप्रीम कोर्ट से वकील किशोर नारायण की मदद से जमानत प्राप्त करने में कामयाबी हासिल की जिसके बाद भी उन्हें नक्सली धाराओं के कानूनी बंदिशों के कारण हर दिन स्थानीय पुलिस स्टेशन को रिपोर्ट करना पड़ता था। जिसके कारण उनकी सभी सामान्य गतिविधियों पर एक प्रकार से रोक लगा दी गई। अंत में 2 जनवरी, 2020 को उन्हें सभी झूठे आरोपों से बरी कर दिया गया। श्री यादव के कार्यों को राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई मानवाधिकार, सामाजिक और पत्रकार संगठनों द्वारा सराहा और सम्मानित किया गया है।

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