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सरकार की खामोशी दंतेवाड़ा पुलिस के गुनाहों पर मौन समर्थन, उपचुनाव में पड़ेगा कांग्रेस पर भारी

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प्रभात सिंह @ दंतेवाड़ा विधानसभा उपचुनाव के बीच दंतेवाड़ा पुलिस द्वारा गुमियापाल के दो आदिवासी ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर उसे मुठभेड़ का नाम दिया जाना छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किलें पैदा करने वाला है। आज होने वाले उपचुनाव मतदान में इसका असर देखने को मिलेगा। आदिवासियों की हत्याओं पर कांग्रेस सरकार की खामोशी दंतेवाड़ा पुलिस द्वारा किये गए इस गुनाह का मौन समर्थन नहीं तो और क्या है।

लेकिन इस मामले में कांग्रेस की खामोशी और भाजपा के कद्दावर नेता धरमलाल कौशिक का समर्थन यह साबित करता है कि गुमियापाल मुठभेड़ पूर्णतः फर्जी है। इससे उन सारे आरोपों को भी बल मिलता है जो भाजपा सरकार के समय सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा बस्तर संभाग में पुलिस पर लगाये जाते रहे हैं।

आदिवासियों की निर्मम हत्याओं का पिछले 15 सालों से चल रहा भाजपा की सरकार में सिलसिला कांग्रेस की सरकार में भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसा नहीं है कि यह घटना अकस्मात घट गई हो यह दंतेवाड़ा पुलिस द्वारा सोची समझी साजिश का नतीजा प्रतीत हो रहा है। जिसमें डीआरजी (हत्यारे आत्मसमर्पित नक्सलियों और पुलिस की जुगलबन्दी) की टोली ने दो निर्दोष आदिवासियों की हत्या को अंजाम दिया है। डीआरजी (हत्यारे आत्मसमर्पित नक्सलियों और पुलिस की जुगलबन्दी) की टोली में शामिल एक आरोपी का नाम पोदिया है जिसे प्रत्यक्षदर्शियों ने पहचान लिया है जो सालों से दर्जन भर मामलों में वांछित हार्डकोर घोषित नक्सलाइट है, क्या आत्मसमर्पण के बाद ऐसे आरोपियों को छत्तीसगढ़ में दुबारा हथियार देकर हत्या करने का लाइसेंस देकर पुलिस बनाने सरकारें फक्र समझती है।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पोटाली में माओवादियों के जमावड़े की सूचना पर दंतेवाड़ा से डीआरजी (हत्यारे आत्मसमर्पित नक्सलियों और पुलिस की जुगलबन्दी) की टोली 13 सितंबर 2019 को दिन में ही निकली थी जैसे कि हर बार होता है। माओवादियों का सूचना तंत्र पुलिस से दो कदम आगे रहता है। माओवादियों को पुलिस के गाँव में आने की सूचना उन्हें पहले ही मिल गई और माओवादियों ने पोटाली छोड़ने का फैसला लिया और अपने सुरक्षित ठिकाने की ओर लौट गए।

वहीं ग्रामीणों का आरोप है कि पोटाली से खाली हाथ लौटते डीआरजी (हत्यारे आत्मसमर्पित नक्सलियों और पुलिस की जुगलबन्दी) की टोली ने गुमियापाल में शराब पी रहे पाँच में से दो आदिवासियों की हत्या कर नक्सलियों के साथ मुठभेड़ का नाम दे दिया।

इधर ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि दंतेवाड़ा में पहले से मन बना चुके एसपी डॉक्टर अभिषेक पल्लव ने पोदिया नाम के नक्सली का चेप्टर क्लोज़ करने आत्मसमर्पित नक्सली पोदिया के हमनाम ग्रामीण पोदिया की हत्या के बाद गुनाहों की फेहरिश्त जारी कर दी और उसके हत्या के बाद खींची गई तस्वीर के साथ माओवादी बताते दो बंदूक जो शायद फायर भी न कर पाए कुछ कारतूस और रोजाना उपयोग की दो चार सामग्री एक जगह दर्शाकर पत्रकारों को इकट्ठा किया और इस हत्याकांड को डीआरजी के द्वारा नक्सलवाद पर फतह बताने की नाकाम कोशिश की है।

आदिवासियों की इस प्रकार की निर्मम हत्या पर ग्रामीणों का आंदोलन थमेगा ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। ग्रामीण फिर आंदोलन करने गाँव से निकलकर शहर पैदल मार्च करते आएंगे और हत्यारे डीआरजी (हत्यारे आत्मसमर्पित नक्सलियों और पुलिस की जुगलबन्दी) की टोली के खिलाफ कार्रवाई के लिए दंतेवाड़ा में अपनी माँगों को दोहराते सरकार से गुहार लगाएंगे।

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