Home » छत्तीसगढ़ » छत्तीसगढ़ में अब घोड़ी की सवारी नहीं कर पाएंगे दुल्हे
छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में अब घोड़ी की सवारी नहीं कर पाएंगे दुल्हे

Read Time1 Second

उत्तम कुमार (संपादक दक्षिण कोसल) @ खबरी चिड़िया छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित ठेठवारपारा में ग्लैंडर्स की पुष्टि होने से छत्तीसगढ़ में हाईअलर्ट की स्थिति है। संस्कारधानी में घोड़ों के आवागमन से लेकर, खेलकूद, शादी-विवाह या किसी भी तरह से उनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अंचल में ब्रूसोलोसिस के आपदा के बाद क्या आप जानते हैं कि आखिर ग्लैंडर्स रोग क्या है? और जब भी इस तरह का मामला सामने आया तो ग्रसित घोड़े को यूथेनेसिया देकर क्यों मारा जाता रहा है? ऐसे ही कुछ तथ्यों के साथ पेश है ये रिपोर्ट राजनांदगांव में यह मामला पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी प्रदेश में रायपुर में 2005-06 में यह खतरनाक ग्लैंडर्स पशु रोग सामने आ चुका है। बहरहाल उपसंचालक डॉ. आरके सोनवणे की सूझबूझ के कारण ग्लैंडर्स रोग से राजनांदगांव को बचाने की कोशिश हुई है। ग्रसित घोड़े का पॉजीटिव रिपोर्ट आने के बाद न केवल अलर्ट जारी किया गया, बल्कि रोग से पीडि़त घोड़ों को चिकित्सीय तरीके से यूथेनेसिया देकर मार दिया गया।

छत्तीसगढ़ के रायपुर के बाद अब राजनांदगांव के ठेठवारपारा में ग्लैंडर्स पॉजिटिव घोड़ी का मामला सामने आया है। इस बीमारी के जीवाणु अति सूक्ष्म होते हैं, जो आसानी से कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं। इस कारण इसके ऊपर दवा ज्यादा असर नहीं करती है। इसलिए इसका कारगर इलाज भी नहीं हो पाता है। कोई जानवर या इंसान अगर इसके संपर्क में आ जाए तो उसमें भी इस बीमारी के पनपने का खतरा रहता है। इंसानों में फैलने के खतरे ने उड़ाई नींद। दरअसल ग्लैंडर्स ऐसा संक्रामक रोग है, जो घोड़ों के साथ ही अन्य पालतू पशुओं बिल्ली, कुत्ता आदि के माध्यम से फैलता है। यह ऐसा रोग है, जो इंसानों को भी आसानी से अपनी चपेट में ले सकता है। चूंकि इसका वायरस पर नियंत्रण के लिए फिलहाल कोई पुख्ता इलाज उपलब्ध नहीं हो सका है, यही कारण है कि संक्रमित घोड़ों को जहर देकर अप्राकृतिक मौत देने के अलावा चिकित्सकों के पास और कोई चारा नहीं रह जाता है।
घोड़े में ग्लैंडर्स बीमारी की पुष्टि होने से घोड़ों के साथ इंसानों की जान को भी खतरा बढ़ गया है। पशु विभाग ने जिलों में अलर्ट जारी किया है।

जिला पशु चिकित्सा विभाग के डॉ. आरके सोनवणे ने बताया कि जिले में तीन और घोड़े हैं। फिलहाल उनमें संक्रमण के कोई लक्षण नहीं हैं। एक घोड़ी में ग्लैंडर्स संक्रमण हो जाने पर उसे मार दिया गया, जिले में घोड़ों की आवाजाही और सार्वजनिक स्थानों में भ्रमण पर छह माह तक प्रतिबंध लगा दिया गया है। अधिकारियों को जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने घोड़ा पालने वालों को अवेयर करने के निर्देश दिए हैं।सीरम सैंपल को जांच के लिए हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीआई) भेजा गया था। इस सेंपल में सीरम सैंपल में ग्लैंडर्स रोग के लिए पॉजिटिव पाया गया है। इसके बाद विभाग हरकत में आया। विभाग की ओर से घोड़े के मालिक रफीक खान को इस बीमारी के संबंध में जानकारी देने के साथ ही एहतियात बरतने कहा गया है। ग्लैंडर्स रोग भारत सरकार के द्वारा नोटिफाईएबल कैटेगरी में आता है। यह बल्कोलडेरिया बैक्टीरिया द्वारा होता है। यह जुनोटिक रोगों की श्रेणी में आता है। यह ग्लैंडर बरखेलडेरिया मेलिआई जीवाणु जनित रोग है। यह घोड़ों के अलावा अन्य स्तनधारी पशुओं और मनुष्य में हो सकता है। डॉक्टर के मुताबिक यह बीमारी संक्रमण के तौर पर फैलती है। यह खाल के घाव, नाक के म्युकोसल सर्फेस व सांस के द्वारा हो सकता है।

इस बीमारी का पता एलाइजा और कॉम्लीमेंट फिक्सेशन (सीएफटी) टेस्ट के जरिए लगाया जा सकता है। एक्यूट फार्म में घोड़ों में इस बीमारी में फेफड़ों में गांठें व श्वसन तंत्र की म्यूकस मैमरेन पर घाव पाए जाते हैं। इसमें पशु खांसी से ग्रसित होता है और नाक से स्राव निकलता है। उसके बाद सैप्टीसीमिया से मौत हो जाती है। क्रोनिक रूप में लिम्फ वैसल पर गांठें, जिसमें घाव बन जाते हैं और उसके बाद मौत हो जाती है।घोड़ों से मनुष्यों में यह बीमारी आसानी से पहुंच जाती है। जो लोग घोड़ों की देखभाल करते हैं या फिर ईलाज करते हैं, उनको खाल, नाक, मुंह और सांस के द्वारा संक्रमण हो जाता है। मनुष्यों में इस बीमारी से मांस पेशियों में दर्द, छाती में दर्द, मांसपेशियों की अकडऩ, सिरदर्द और नाक से पानी निकलने लगता है।जब भी यह बीमारी घोड़ों में हो जाती है तो इसका ग्लैंडर्स फारसी एक्ट के तहत कोई ईलाज भारत में नहीं है। जांच में ग्लैंडर्स मिलने पर घोड़े का अंत दर्द रहित मृत्यु यानी यूथेनेसिया ही है। इसके बदले सरकार की ओर से मुआवजे के रूप में घोड़े के लिए 25 हजार जबकि गधा या खच्चर के लिए 16 हजार रुपये मुआवजा दिया जाता है। इसके बचाव के लिए कोई टीका मौजूद नहीं है।

डायरेक्टर ने सभी पशु चिकित्सकों को निर्देश दिया है कि यदि किसी भी घोड़े में इस तरह के लक्षण पाए जाएं तो उसे आबादी से अलग बांधा जाए। उसके परिवहन पर रोक लगा दी जाए। संबंधित जगह का डिसइंफेक्शन कराया जाए और घोड़े का सैंपल लेकर जिला चिकित्सालय के जरिए इसे हिसार हरियाणा के राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान संस्थान भेजा जाए।राजधानी दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाण, उत्तरप्रदेश के बाद छत्तीसगढ़ में घोड़े ग्लैंडर्स बीमारी की मार झेल रहे हैं और घोड़ा पालकों के माथे चिंता की लकीरें उभर आई हैं। ग्लैंडर्स बीमारी की चपेट में आने वाले घोड़ों को मार दिया जाता है जिस वजह से घोड़ा पालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। सरकार ने पशुपालन विभाग को ग्लैंडर्स बीमारी की चपेट में आए घोड़ों को मारने का आदेश दिया है। देश के पशुपालन केंद्र ने गुजरात, उत्तराखंड़, जम्मू कश्मीर, दिल्ली, राजस्थान समेत कई राज्यों से सैंपल आ रहे है। अब इस रोग के मामले लगातार बड़े स्तर पर सामने आ रहे है। हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान(एनआरसीई) केंद्र के अनुसार यह बीमारी कुछ दिन से लेकर महीनों तक प्रभावित करती है, अगर पशुपालक को इस बीमारी के लक्षण दिखें तो तुरंत पास के पशु चिकित्सालय में इसकी सूचना दें और खून की जांच कराएं। ग्लैंडर्स बीमारी एक संक्रामक रोग है।

इस बीमारी के बैक्टीरिया सेल में प्रवेश कर जाते हैं। इलाज से भी यह पूरी तरह नहीं मरते हैं। ऐसे में दूसरे जानवर और इंसान भी इससे संक्रमित हो जाते हैं। यह बीमारी ऑक्सीजन के जरिये फैलती है। शरीर में गांठे पड़ जाती हैं। गांठों में संक्रमण होने के कारण घोड़ा उठ नहीं पाता है और बाद में उसकी मृत्यु हो जाती है। लक्षण गले व पेट में गांठ पड़ जाना जुकाम होना (लसलसा पदार्थ निकलना) श्वासनली में छाले फेफड़े में इन्फेक्शन बचाव के लिए क्या करें पशु को समय पर ताजा चारा-पानी देना बासी खाना न दें ज्यादा देर तक मिट्टी-कीचड़ में न रहने दें साफ-सफाई का ध्यान रखना गर्मी में नहलाना दवाओं का छिडक़ाव जरुर करें बीमार पशुओं के नजदीक न जाने दें। इस बीमारी से प्रभावित पशु को मारने के बाद गड्ढे में दबा देना चाहिए या जला देना चाहिए। डॉ. सोनवणे ने बताया कि शासन द्वारा अधिसूचना जारी होने के बाद 25 जून को शाम यूथेनेसिया दिया गया है। पशु चिकित्सा विभाग राजनांदगांव के उपसंचालक डॉ. सोनवाने की उपस्थिति में पशुमालिक से सहमति लेकर ग्लैंडर्स से ग्रसित घोड़ी को दर्द रहित मृत्यु (यूथेनेसिया) दिया गया। डॉ. सोनवणे ने बताया कि पूरी प्रक्रिया विशेषज्ञों की देखरेख में नवागांव में हुई। इसके लिए निगम कि जेसीबी की मदद से 8 बाई 8 का गड्ढा खोदा गया। गड्ढे में 25 बोरी चूना, 1 बोरी नमक, 5 लीटर फिानाइल का छिडक़ाव किया गया। डॉ. के इस टीम में डॉ तरूण रामटेके, डॉ. प्रेम देवांगन, डॉ. अजय शर्मा, डॉ. सत्यजीत मेश्राम, डॉ. फणेश्वर साहू तथा डॉ. शिरष शाव उपस्थित थे।

घोड़े,खच्चर, गधों में होने वाली ग्लैंडर्स बीमारी जानवरों के अलावा मनुष्य के लिए भी घातक है। यह संक्रामक बीमारी बहुत तेजी से फैलती है। फिलहाल वैज्ञानिक इसका इलाज नहीं खोज पाए हैं। केवल रोकथाम का एक मात्र उपाय संक्रमित जानवरों को मारना पड़ता है। मगर विज्ञानिकों का कहना है कि जो लोग इन जानवरों को पालते हैं, वे बीमारी होने के बाद भी इन्हें मारने नहीं देना चाहते। इस कारण से इसकी रोकथाम में काफी परेशानी आती है।
ग्लैंडर्स बीमारी की निगरानी निदान को लेकर हिसार के राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र में अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला ने कई देशों के विशेषज्ञों के साथ इस बीमारी को लेकर मंथन किया। इसमें ओआईई वल्र्ड ऑर्गेनाइजेशन ऑफ एनीमल हेल्थ के निदेशक हेनरिक न्यूबॉर तथा एनआरसीई के निदेशक बीएन त्रिपाठी ने बताया कि इसमें श्रीलंका, भूटान, नेपाल, पाकिस्तान, इरान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश जर्मनी के विशेषज्ञ भी पहुंचे थे।ग्लैंडर्स बैक्टीरिया का प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में जैविक हथियार के तौर पर भी प्रयोग किया गया था। घोड़ों में ग्लैंडर्स बीमारी फैलाने के लिए पानी में बैक्टीरिया डालकर घोड़ों को पीला दिया था।

इसके अलावा मनुष्य में इस बीमारी का फैलने का डर इसलिए रहता है, क्योंकि ऐसा पहले हो चुका है। चेकोस्लोवाकिया में संक्रमित घोड़ों का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को भी रोग हो गया था। संक्रमित जानवरों को मारकर जमीन में दबाते है। देशभर में सैंकड़ों घोड़ों को एक चिंताजनक बीमारी ने संक्रमित कर दिया है। इस बीमारी की वजह से हर जानवर और यहा तक कि इंसान भी इसका शिकार बन जाता है। ग्लैंडर्स रोग हरियाणा में सोनीपत जिले में 3 और यमुनानगर में दो घोड़ों को चपटे में ले चुके हैं। हिसार स्थित राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र द्वारा बीमारी की पुष्टि करने के बाद एक घोड़ेे को टीका लगाकर मारा जा चुका है। बाकि चार घोड़ों को मारने की तैयारी वैज्ञानिक कर चुके हैं। मनुष्य में इस रोग का कोई केस सामने नहीं आए। लेकिन विश्व में इंसान में यह बिमारी अमेरिका में सन 2000 में देखने में मिली थी।इस बिमारी का उपचार काफी महंगा होता है। इसके लिए 9 माह से 1 साल तक इलाज करवाना पड़ता है। ऐसे में घोड़े, गधे और खच्चर को मारने की ही सलाह दी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि मरने के बाद रोग ग्रस्त पशु को 8 फीट गहरे में गढ्ढे में डालकर उसके ऊपर चूना डालना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि मृतक पशु को किसी भी हालत में कुत्ते या अन्य जानवर न खा पाए। अन्यथा यह रोग काफी तेजी से फैल सकता है।

अब एक बार फिर इस रोग के मामले लगातार बड़े स्तर पर सामने आ रहे है। यूपी, गुजरात, श्रीनगर, हिमाचल व हरियाणा के बाद छत्तीसगढ़ में इस रोग ने पांव फैलाने शुरु कर दिए है। देशभर में अब तक 366 घोड़ों में रोग की पुष्टि हो चुकी है जो कि काफी बड़ा आंकड़ा है। दिल्ली में ग्लैंडर्स बीमारी की चपेट में आए सात घोड़ों को पशुपालन विभाग ने मार दिया। गुजरात में सबसे अधिक 65 घोड़ों में यह रोग पाया गया है। देशभर में हिसार में इस रोग के सैंपल की जांच की जाती है। उनका केंद्र सैंपल को 3 दिन में जांच की रिपोर्ट दे देता है। यह जानलेवा रोग दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाण, उत्तरप्रदेश से होते हुए छत्तीसगढ़ पहुंच गया है। आंकड़ों की माने तो 19वीं पशुगणना के अनुसार देशभर में करीब 11.8 लाख अश्व प्रजाति (घोड़ा, गधा, खच्चर) है, इससे लाखों परिवारों की अजीविका जुड़ी हुई है। इस बीमारी का फैलाव सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से हुआ है। पशु मेलों में खरीदे और बेचे गए घोड़े देश के विभिन्न हिस्सों में जाते है। अभी यूपी के अलावा गुजरात, उत्तराखंड़, जम्मू कश्मीर, दिल्ली, राजस्थान समेत कई राज्यों से सैंपल आ रहे है। डॉ. सोनवणे ने बताया कि नोटिफिकेशन जारी कर अब शादी विवाह में भी घोड़ों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अधिसूचना में सरकार ने साफ कहा है कि इस बीमारी के संक्रमण बचाव के लिए चिकित्सीय सुझााव अमल में लाने चाहिए।

0 0
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %