बस्तर

माओवादियों की पहली आत्मसमर्पण नीति, पुलिस में शामिल नक्सलियों और मुखबिरों को गाँव लौटने पर पैकेज

  • साथियों के लगातार समर्पण और पुलिस मुखबिर बनते, गांव छोड़ते आदिवासियों की वजह से नक्सलियों ने बदली रणनीति
  • आत्मसमर्पित नक्सलियों, ग्रामीणों और मुखबिरों को पुलिस का साथ छोड़ वापस लौटने की मार्मिक अपील

कमल शुक्ला @ खबरी चिड़िया बस्तर “बस्तर में लगातार आत्मसमर्पण की खबरें आती रहती हैं ऐसा लगता है कि लगातार साथियों के समर्पण, गिरफ्तारी, मुठभेड़ में मारे गए साथियों और उनकी नीतियों व मुखबिरी की वजह से तेजी से जंगल छोड़ रहे ग्रामीणों की वजह से नक्सलियों के बड़े लीडरों में हताशा आ रही है । सम्भवतः इसी वजह से माओवादियों के दक्षिण बस्तर डिवीजन कमेटी ने नीतियों में बदलाव करते हुए अब मुखबिरी कर पार्टी को नुकसान पहुंचाने और पुलिस के खेमों में चले गए आदिवासियों से वापस लौटने की अपील करते हुए एक पर्चा जारी किया है ।”

एक ओर जहाँ सरकार और पुलिस नक्सलियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए पुनर्वास नीति चला रही है। वहीं दूसरी ओर बस्तर के जंगलों में नक्सली भी सरकार की तर्ज पर पुलिस की नौकरी और मुखबिरी छोड़कर वापस आने वाले आत्मसमर्पित नक्सलियों के लिए पुनर्वास नीति चलाने की पूरी तैयारी कर चुके है । जिसके लिए माओवादियों ने पर्चा जारी कर आव्हान भी किया है। आत्मसमर्पित नक्सली नेताओं द्वारा अपने साथियों को आत्मसमर्पण कर सुखी जीवन यापन करने के लिए लिखे गए पत्र भी माओवादियों के हाथ लग गए है। जिसके बाद नक्सलियों ने पत्र लिखने वाले आत्मसमर्पित नक्सली नेताओं को गद्दार करार देते हुए गलती न दोहराने का फरमान जारी किया है।

माओवादियों की जगरगुंडा एरिया कमेटी और दक्षिण बस्तर डिविजनल कमेटी ने अलग-अलग प्रेस नोट जारी किया है। जगरगुंडा एरिया कमेटी द्वारा जारी प्रेस नोट में नक्सलियों ने कहा है कि पुलिस के लिए गोपनीय सैनिक का काम करने वाले सिलगेर निवासी कोरसा देवा ने जनअदालत में नक्सलियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। कोरसा देवा 2007 से 2012 तक माओवादी संगठन का हिस्सा था। जिसने 2015 में तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लूरी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। जिसे बाद में 2017 में बर्खास्त कर दिया गया था। जिसने अब उनके सामने समर्पण कर दिया है। इस घटना के बाद नक्सलियों ने कहा है कि पुलिस की नौकरी छोड़कर गांव वापस आने वालों को उनकी जनताना सरकार द्वारा घर, द्वार और जमीन दिया जाएगा और कई लोगों को दिया भी गया है।

वहीं दक्षिण बस्तर डिविजनल कमेटी द्वारा जारी एक प्रेस नोट में माओवादियों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने वाले अपने डीवीसी मेम्बर मड़कम अर्जुन नाम के प्रति घोर आक्रोश प्रकट करते हुए अपने पर्चे के शीर्षक में ही उसे गद्दार बताया है। उन्होंने पर्चे में बताया है कि अर्जुन ने 24 फरवरी 2019 को पुलिस के सामने समर्पण कर दिया है और अब वह अपने साथी सीएनएम टीम की सदस्य आयते और मूड़े को पत्र लिखकर आत्मसमर्पण करने को कह रहा है। जबकि उन्हीं महिलाओं के साथ उसके अवैध संबंध थे। वह खुद अब माओवादियों पर महिलाओं के शोषण व माओवादी संगठन में तेलगु और कोया नेतृत्व में भेदभाव का झूठा अफवाह फैला रहा है जो पूरी तरह झूठा है।

” मड़कम अर्जुन के अलावा वेट्टी रामा, वेट्टी मुकेश, माड़वी नरसिंह, माड़वी भीमा, सन्नू , शंकर, गणेश और देवा नागेश आदि आत्मसमर्पित नक्सलियों का उल्लेख करते हुए माओवादियों ने अपने साथियों व ग्रामीणों से अपील की है कि वे इनके रास्ते न चले, बल्कि जल, जंगल और जमीन के लिए लड़ते हुए जीने वाले नायक गुंडाधुर, गेंदसिंह जैसे शहीदों के रास्ते अपने हक के लिए लड़ते हुए जियें। उन्होंने चेताया भी है कि लड़ाई कमजोर होने पर बस्तर के जल जंगल और जमीन पर सेठों का कब्जा हो जाएगा और लोगों को अपनी ही जमीन पर भीख मांगते जीना पड़ेगा ।”

“वहीं चिंतलनार थाना प्रभारी और कोबरा कमाण्डेन्ट पर आरोप लगाया है कि उनके द्वारा तिम्मापुर के हेमला भीमा के हाथों तिम्मापुर के सोढ़ी मनीष को बंदूक के साथ समर्पण करने के लिए तीन बार पत्र भेजा गया है जबकि मनीष एक किसान है। उसके पास न तो बंदूक है और न ही वह कोई नक्सली है। नक्सलियों का आरोप है कि पुलिस ग्रामीणों को डरा धमका कर जबरन आत्मसमर्पण करवाकर इनामी नक्सलियों के नाम से पैसे कमाने का धंधा चला रही है और दूसरी ओर बेकसूर ग्रामीणों की हत्याएं भी कर रही है। “

“माओवादियों ने पुलिस खेमे में गए आदिवासियों और अपने साथियों से वादा किया है कि उनके लौट आने पर उनकी जमीन और जानवर सभी वापस कर दिए जाएंगे। साथ ही जनअदालत के गलत हुए फैसलों के खिलाफ भी कार्यवाही की बात उन्होंने कही है। इस पर्चे को लेकर कहा जा सकता है कि माओवादी लगातार खाली हो रहे जंगल और गांव को लेकर अपने आंदोलन के भविष्य को लेकर चिंतित है और अब वे एक कदम पीछे की रणनीति के तहत यह कदम उठा रहे हैं ।”

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