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संगीत के पुरोधा खुमानलाल साव का चले जाना एक युग का अंत

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उत्तम कुमार (संपादक दक्षिण कोसल) @ खबरी चिड़िया छत्तीसगढ़ी संगीत के पुरोधा खुमान साव का चले जाना एक युग की समाप्ति कहा जा सकता है। दक्षिण कोसल ने 2015 के अंक में उनसे लंबी बातचीत की थी। विडंबना देखिए कि उन्हें पद्मश्री जैसे सम्मान से नहीं नवाजा गया था। लंबे संघर्षों के बाद 2016 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। रामचंद्र देशमुख ने कहा था कि भारतीय लोकजीवन को लोकगीतों के माध्यम से अधिक सार्थकता के साथ संदेश पहुंचाए जा सकते हैं। लोक बोलियों लोकभाषा जिन अनुभूतियों एवं संवेदनाओं को जितनी अधिक सटिक व्यंजना दे सकती है संभवत: उतनी कोई अन्य भाषा नहीं। दूसरी बात यह है कि फिल्मों के माध्यम से आए हुए पश्चिमी बोध या फिल्मों में ओढ़े गए पूर्वी बोध की तुलना में चंदैनी गोंदा दर्शक को विशुद्ध ग्राम बोध प्रदान करता है। ग्राम बोध इसलिए भी क्योंकि इसमें आज के एक भारतीय गांव के खेतिहर जीवन की कथा व्यथा है। संवाद, दृश्यों और प्रतीकों के माध्यम से लोकगीतों को ज्यादा प्रभावकारी बनाया गया है इसके द्वारा निहितार्थ को भी सम्प्रेषित करने का प्रयास किया गया है।

यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि चंदैनी गोंदा के विरासत को जीवित रखने वाले और छत्तीसगढ पीड़ितों के जीवन में संगीत का रस घोलने वाले का नाम खुमानलाल साव हैं। उनके ऐतिहासिक परिपेक्ष्य तथा छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास के पन्नों को पलटने से मालूम होता है कि दाऊ दुलारसिंह मंदराजी ने लोकनाट्य नाचा की सदियों से चली आ रही परम्परा को संगठित रूप प्रदान किया था। उन्होंने 1928-29 में ‘रवेली नाचा पार्टी’ बनाई जिसमें उनके गांव के ही कलाकार थे। उन दिनों खड़े साज का प्रचलन था सभी कलाकार अपने साज कमर में बांधकर या गले में लटकाकर नाचा किया करते थे। मदन निषाद, ठाकुरराम, लालूराम, गोविंद राम निर्मलकर, झुमुकदास, न्यायिकदास व बाबूराम आदि ने मिलकर ‘रिंगनी रवेली पार्टी’ का गठन किया था।

चाचा रामरतन साव और फूफा तीजूराम अच्छे लोकनर्तक थे। नाचा के पुरोधा उनके मौसेरे भाई थे। उनकी रवेली नाचा पार्टी की प्रस्तुतियों ने ही नाचा की ओर उन्हें आकर्षित किया। अपने पिता के द्वारा जमशेदपुर (झारखंड) से लाए गए हारमोनियम को बजाते हुए उन्होंने हारमोनियम सीखा। 14 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने खड़े साज में हारमोनियम बजाना शुरू कर दिया। सांस्कृतिक धरोहर की एक लंबी फेरहिस्त मेें 1949 में जीवनलाल चंद्राकर व बंशीलाल देवदास के निर्देशन में कुरूद नाचा मंडली, धरमलाल कश्यप के निर्देशन में जांजगीर नाचा मंडली, 1944-50 में भरोसा व सीताराम के निर्देशन में बसंतपुर नाचा मंडली, 1948-53 में लाला फूलचंद श्रीवास्तव के निर्देशन में रायगढ़ नाचा मंडली तथा 1944-55 तक स्व मंदराजी के निर्देशन में रवेली नाचा पार्टी में हारमोनियम वादक के रूप में काम किया। इसके अलावा 1940-50 के दशक में रायपुर व बिलासपुर संभाग की अनेक छोटी बड़ी नाचा मंडलियों में अपनी भूमिका अदा की। उन्होंने नाचा शिविरों का आयोजन कर नाचा के शिल्प, कथानक, भाषा को सुधारा, गीतों को व्यवस्थित करना सिखाया। फिल्मी गीतों के प्रति लोगों के रूझान को देखते हुए 1948-50 में राजनांदगांव की प्रथम आर्केस्ट्रा पार्टी ‘खुमान एंड पार्टी’ बनाई 1952 में शारदा संगीत समिति व 1957 में सरस्वती कला संगीत समिति तथा कालांतर में राजभारती आर्केस्टा का गठन किया।

राजनांदगांव के प्रसिद्ध चित्रकार हीरासिंह गौतम ने 1970 में अस्तित्व में आए चंदैनी गोंदा के लिए खुमान का नाम चंदैनी गोंदा के पुरोधा रामचंद्र देशमुख को सुझाया था। चंदैनी गोंदा ने अंचल के लोगों को हीन भावन से ऊपर उठाकर उनके अंदर स्वाभिमान का बीज बोने का काम बखूबी किया था। इससे प्रभावित होकर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में कई लोक सांस्कृतिक संस्थाओं का गठन हुआ। रामचंद्र देशमुख के द्वारा विसर्जित कर दिए गए चंदैनी गोंदा के ध्वज को खुमान साव ने उठाए रखा है। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि ममता चंद्राकर को गायिकी के ऊंचाइयों में पहुंचाने के लिए जिस तरह महासिंह चंद्राकर के सोनहा बिहान को श्रेय जाता है उसी तरह छत्तीसगढ़ी संगीत के लिए खुमान साव का योगदान महत्वपूर्ण हैं।लोक संगीत के पुरोधा साव बताते हैं कि छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के रूप में झुकाव उन्हें बचपन से ही रहा है। उसी पर काम करते हुए लोगों के सामने आया हूं। अभी तक वही काम कर रहा हूं। संगीत में भाषा महत्वपूर्ण है छत्तीसगढ़ी भाषा में ही काम करना मेरा प्रमुख उद्देश्य है। कवियों के गीतों को सजाता संवारता हूं। मेरी खोज लोकसंगीत की ओर है जो गावों में है। शहर में लोकसंगीत नहीं मिलेगा। शहर में ले जाकर प्रदर्शित करते हैं। फिर भी जिस संस्कार को हम जी रहे हैं उधर तो झुकाव रहेगा।

आकाशवाणी से प्रसारित होने वाली कार्यक्रमों में 1972 तक छत्तीसगढ़ी लोक गीत व संगीत का नामोनिशान नहीं था। प्रत्येक सोमवार को घुमका निवासी तिवारी चौपाल में बांस गीत गाया करता था। इसके सिवाय छत्तीसगढ़ी में गीत संगीत नहीं होता था। वे 27 गीतों को रिकार्ड कर आकाशवाणी ले गया और उनको सुनाया। ये है छत्तीसगढ़ी लोक संगीत जब बंगाल में बंगाली, महाराष्ट्र में मराठी, गुुजरात में गुजराती गया जाता है तो यहां छत्तीसगढ़ी गीत क्यों नहीं सुने जाते हैं? 1972 के बाद उसके पहले दो गीत केशरीलाल वाजपेयी जो बरसाती लाल के नाम प्रसिद्ध था। उसी के गीत बजते थे। 1972 से इतना कार्य उन्होंने किया कि छत्तीसगढ़ में लोक संगीत छा गया। वे कहते हैं जो हुआ वो बतला रहा हूं। इसे मेरा अहम नहीं समझना, आज जहां जाता हूं इसी नाम से पहचाना जाता हूं। लोग पुकारते हैं कि ये मूर्धन्य आदमी है। सांस्कृतिक संस्था में कविता वासनिक को लाने वाला मैं हूं। लक्ष्मण मस्तुरिया को गीत गवाने वाला मैं ही पहला आदमी हूं। हाल ही में साहित्य महोत्सव नया राजधानी में हुआ था। जिसमें तीन विधाओं को शामिल किया गया था साहित्य, पुरातत्व व एक लोकसंगीत था उन बोलने वालों में मैं, लक्ष्मण मस्तुरिया, लाल राम कुमार सिंह, ममता चंद्राकर, रिखी क्षत्रीय व एक जगदलपुर से लोकसंगीत का जानकार शिक्षक भी था वहां एक घंटा का कार्यक्रम था। 6 आदमी बोलने वाले जिसमें छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के बारे में बोलने के लिए 10 मिनट का समय सभी को दिया गया था जिसमें 5 मिनट परिचय बताने में ही निकल गए। लाल कुमार को सूत्रधार बनाया था जो पूर्व में आकाशवाणी उद्घोषक थे अब रिटायर हो गए हैं, उसने सबसे पहले दर्शकों के सामने मुझको खड़े कर दिया।

आप बुजुर्ग हो आप बोलिए मुझको भाषण देने नहीं आता? तो उसने मेरे नाम की घोषणा कर दिया और मैंने बोलना शुरू किया 10 हजार भीड़ जो लोक कला व संस्कृति को समझते हैं सभी पहुंचे थे। दिलचस्प बात यह कि गांव व शहर के लोग आए हुए थे। समझने वाले लोग आए थे तो मैं मंच पर खड़ा हुआ खड़ा होकर तल्खी के साथ बोला कि लगता है कि हमारे पर्यटन विभाग में बुद्धिजीवी टाइप का आदमी कोई नहीं है विचार कीजिए कि जो 10 मिनट हमें बोलने देता है उनको कितना विद्वान मानते हो? बताओ? छत्तीसगढ़ी संगीत पर बोलना चाहूंगा तो 10 साल लगेगा और खत्म नहीं होगा। उधर दर्शकों व श्रोता एक साथ बोल उठे कि 15 घंटे बोलिए। मैंने अपना वक्तव्य शुरू किया यह कि एक ताल होता है छत्तीसगढ़ लोक संगीत में उस ताल को या कहे कि भारतीय संगीत में उसी टाइप के ताल को देवताल कहते हैं। धु्रपद केवल मंदिरों में होता है हमारे यहां देवताल का प्रभाव होता है। गौरा का पूजा रात को करते हैं उसमें आपने देखा होगा कि उस भाषा के जानकार जब गाना गाते हैं तब दसियों औरतें झूमने लग जाते हैं। यह देवताल का प्रभाव है। उसका सबूत बतला रहा हूं मेरे गांव में 3 दिन तक जस का प्रतियोगिता हुआ है एक भी लोगों को देव नहीं चढ़ा क्योंकि वे देवताल नहीं बजाते थे जहां देवताल बजेगा निश्चित रूप से एक न एक आदमी झूमेगा। हमारे समय में 14 नवंबर बाल दिवस से इंदिरा गांधी के जन्म दिन तक सरकार बाल दिवस मनाती थी। टीम बनाकर जब देवताल बजाया जाता था तब सीखते हुए 5-5 लड़कियां देवताल में झूम उठते थे। पहले सांस्कृतिक आयोजन स्थानीय, ब्लाक, जिला व राज्य स्तर पर होता था। इस तरह स्कूल स्तर पर हमारी टीम पूरे प्रदेश में एक बार सेकंड व हमेशा फस्र्ट आई थी। टीटीनगर भोपाल में गौरा झांकी के प्रदर्शन को लाखों-करोड़ों के नुकसान देने के एवज में करने दिया गया था इस आयोजन में 6 लड़कियों के साथ दो लोग बैगा बन गए जिसमें 7 लोगों को देव चढ़ा। बताइए हमारे संस्कृति से उन्हें क्या लेना देना उनकी बुंदेली थी गौरतलब यह कि देवताल की ताकत पर 7 को देव चढ़ा।

कैलास जोशी के मुख्यमंत्री रहते हुए उत्तरप्रदेश गए महासमुंद से समाजवादी पार्टी वाले पुररूषोत्तम कौशिक ने हमें बुलवा कर हमें सम्मेलन में भेजा, हमारा आयोजन लोगों को काफी पसंद आया। झांसी से 20 किलोमीटर दूरी पर महुरानीपुर एक शहर है वहां लोक संगीत के आयोजन में कैलाश जोशी ने हमें वहां चुनकर भेजा। वहां गौरा पेश किया वहां के लोग छत्तीसगढ़ी को नहीं जानते थे हम अपने आपको उपेक्षित महसूस करते थे। आश्चर्य का विषय यह कि हमारे देश के लोग ही हमें नहीं जानते थे। हां छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस का नाम लोगों ने सुन रखा था और कुछ नहीं। इस आयोजन में लखनऊ दूरदर्शन के डायरेक्टर टीम लेकर आया था।हम मनमाने रिहर्सल कर लिए थे एक हाईस्कूल में 8 राज्यों के कलाकारों को ठहराया गया था। बंगाल, महाराष्ट्र, उड़ीसा व मणीपुर से पार्टी आई थी हम लोग तो उपेक्षित क्षेत्र के हैं। कार्यक्रम के दौरान सोफा में बैठी कलेक्टर की पत्नी हमारे कार्यक्रम को देखते हुए देवताल में झूमते हुए मंच पर चले आई। दो मिनट के अंतराल में 22 लोग हमारे देवताल में झूम उठे थे। कलेक्टर ने ललकारते हुए कहा कि बंद करो इस धुन को नहीं तो सभी को हवालात में बंद कर दूंगा। बाद में उसे दवाई सूंघाकर ठीक कर दिया। दूसरे दिन सुबह दो सिपाही को बुलवाकर कलेक्टर ने हमारा चाय नाश्ता के साथ मान सम्मान किया और कला के संबंध में सवाल पूछते रहे। वास्तव में देवताल का सभी पर प्रभाव पड़ता हैं यदि देवताल नहीं बजेगा तो कुछ नहीं हो पाएगा। शहडोल के गांव में जब हमने गौरा पेश किया तो स्टेशन मास्टर, स्टेशन छोडक़र भागते हुए गौरा में झूमने चले आया, आकर नाचना शुरू कर दिया। लोग कहने लगे कि यह आदमी किसी से बात भी नहीं करता इसे अचानक क्या हुआ? दो चार तगड़े लोग उसको पकड़े और देव के सामने दवाई सुंघाए। बाद में अपने आप उठकर रेंगते हुए चला गया। साहित्य सम्मेलन में संस्कृति के विविध विधाओं के बारे में लोगों को यह भी बताया कि देवताल का प्रभाव गंभीर है उसकी आलोचना व उपहास नहीं करना चाहिए।

संगीतकार के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता का जहां तक सवाल है मैं बताना चाहूंगा कि मरवाही से अजीत जोगी चुनाव लड़ रहे थे आपको बता दूं कि कि अजीत जोगी जब कलेक्टर थे तब से उनसे जान पहचान हैं। राजिम व डोंगरगढ़ में विभिन्न अवसरों में उनसे सामना हुआ। एक बार हमारे माइक संचालक से माइक छिनकर आयोजक जबरन बोलने लगे कि जोगी जी आए हैं अब 2 मिनट कुछ बोलेंगे। मैं सख्ती के साथ आयोजकों को कहा कि वे नेता होंगे लेकिन आप लोगों ने कैसे माइक छिन लिया यह मंच की मर्यादा का सरासर उल्लंघन है। उसके बाद मंच के नीचे से उठ कर जोगी बोले कि साव जी दो मिनट से ज्यादा नहीं बोलूंगा। मैं बहुत नपा-तुला आदमी हूं। जवाब में मैंने कहा कि तो नपे तुले समय पर क्यों नहीं आएं। सभी के चिल्लाए जाने पर उन्हें 2 मिनट के लिए बोलने दिया गया। आश्चर्य यह कि जोगी बिल्कुल 2 मिनट में अपना वक्तव्य खत्म कर मंच से उतर गए। मारवाही विधान सभा के प्रचार का प्रस्ताव आया कि 18 कार्यक्रम मिला है एक-एक कार्यक्रम में 25-25 हजार मिलेगा और साथ में शर्त यह जोड़ दी कि एक दिन में 3 कार्यक्रम करने होंगे। पैसा पेशगी ले या फिर इच्छा के अनुसार जैसा चाहे मैंने कहा कि 18 क्या एक भी कार्यक्रम नहीं करेंगे। यदि 1 लाख रुपए एक घंटे का दोगे तो भी नहीं जाऊंगा यानी चुनाव प्रचार कार्यक्रम में नहीं जाऊंगा। दूसरे दिन बृजमोहन अग्रवाल के आदमी धमक गए।

मेरा मानना है कि किसी भी सांस्कृतिक दल को किसी भी दल विशेष की प्रचार करने नहीं जाना चाहिए क्योंकि कल दूसरा राजा आ जाएगा। सवाल उठता है कि आप किसको-किसको खुशामद करते रहोगे? यदि कोई तकलीफ आएगी तो यही कहने लगेंगे कि जाओ जिसका प्रचार किए थे उन्हीं के शरण में जाओ कहने का तात्पर्य यह है कि ‘कोई नेक होई हमर का हानि…’। राज्य विकसित होने के बाद सभी ने विकास की बातें करना शुरू कर दिया है कहने का तात्पर्य यह है कि जब से राजनेता कुर्सी सम्हाले हैं क्या तभी से विकास होना शुरू हुआ है? सभी विकास का ढिंढोरा पीटने के साथ अपने घर भरने लगते हैं। मैं ऐसे झंझटों से दूर रहता हूं। दिखावा क्षेत्र का विकास कतई नहीं होता है।संगीत के विकास और उसके सार्थक फैलाव में रेडियो व दूरदर्शन कुछ नहीं कर रहे हैं। दूरदर्शन में पाणिग्रही डायरेक्टर होकर आए थे। दूरदर्शन से एक पत्र उन्होंने मेरे नाम भेजा था जिसमें मुझसे मिलने की इच्छा व्यक्त की थी उसके बाद रायपुर से मेरे मित्र कदम के साथ दूरदर्शन गया। उन्होंने मिलते ही कहा कि आप हमारे दूरदर्शन में कार्यक्रम देने क्यों नहीं आते हैं? मैंने बताया कि कलकत्ता, दिल्ली, उड़ीसा में दूरदर्शन में कार्यक्रम कर चुका हूं। छत्तीसगढ़ में जब दूरदर्शन का शिलान्यास हुआ उस समय विद्याचरण शुक्ल मंत्री थे। मेरा कहना है कि बिना बुलाए भगवान के पास नहीं जाएंगे। उस आयोजन में 15 मिनट के कार्यक्रम में तीन नृत्य प्रस्तुत किया था। मैं पाणिग्रही से कहा कि आप हमारा प्रतिनिधित्व कर रहे हो आपको ददरिया की पहचान नहीं है। आप अपने कार्यक्रमों में फूहड़ व वाहियात चीजों को ददरिया के रूप में परोस रहे हैं। वे तपाक से बोल उठे कि क्या वह ददरिया नहीं है। नहीं? मैंने कहा कि ददरिया क्या है आप मुझसे पूछो? उसमें ताल नहीं होता? ढोलक नहीं होता? गांव में बिना वाद्य व रीदम के गाए जाने वाले गीत व नृत्य को ददरिया कहा जाता है।

खेतों में खलिहानों में मेहनत के साथ गाए जाने वाले गीतों में जब आप चुटकी बजा कर टटोलेंगे तो ज्ञात होगा कि वहां भी गीत हैं वहां भी संगीत हैं। मैंने उनसे कहा कि आपको कला व संस्कृति की समझ होनी चाहिए क्योंकि आप हमारा प्रतिनिधित्व कर रहे हो आपको ददरिया नहीं मालूम? मैं यहां आवश्यक कार्यक्रम लेकर आऊंगा लेकिन पारिश्रमिक लूंगा। उन्होंने जवाब दिया कि हम पारिश्रमिक नहीं देते हैं? मैंने नम्रता के साथ जवाब दिया कि जिस दिन हमारे लिए पारिश्रमिक आएगा उस दिन हमें बुलाना। वास्तव में दूरदर्शन में लोग पैसा देकर कार्यक्रम प्रस्तुत करवाते हैं इससे दूरदर्शन वालों का पेट बढ़ रहा है। रामचंद्र देशमुख पर अपनी टिप्पणी जाहिर करने से पूर्व यह कहना चाहूंगा कि छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक विरासत में उनकी ऐतिहासिक भूमिका है? मेरा उनसे अच्छा संबंध था। उनका कहना था कि मैं छत्तीसगढ़ की सेवा कला के माध्यम से करूंगा। खूबचंद बघेल ने उनको कला व संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए चिट्ठी लिखी थी। उनकी बड़ी पुत्री रामचंद्र देशमुख के लिए आई थी। देशमुख कुशल आयुर्वेदिक डॉक्टर व साहित्यकार भी थे। इस बात को खूबचंद जानते थे कि रामचंद्र नेता बनकर नहीं कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सेवा कर सकता है? उनके मन में आया कि एक संस्था बनानी चाहिए। यहां की जानकारी छत्तीसगढिय़ों को देनी चाहिए। कई बार शुक्ल बंधुओं ने भी बुलाया वे किसी दल में नहीं गए। सांस्कृतिक संस्था के माध्यम से जो अभाव है उस पर सन् 1970 से लगातार कार्य करते रहे। उस समय यहां पानी व बिजली का अभाव था। सबसे खतरनाक बात यह है कि हमको हिन्दी व अंग्रेजी बोलना पड़ता था। हमारी संस्कृति का स्तर हमारे हालातों जैसा गिरा हुआ था। इन सभी चीजों का हम सिर्फ जनता को बतलाते थे। हम आंदोलन व सत्याग्रह नहीं करेंगे लेकिन ये सब हो रहा है छत्तीसगढ़ के परंपरा पर कुठाराघात हो रहा था। उस जमाने में मैं राजभारती आर्केस्ट्रा का निर्देशक था। जिसे मैंने 1970 में छोड़ दिया था मैं आर्केष्ट्रा पार्टी चलाता था।

बात तबकी है जब कार्यक्रमों में माइक का दखल नहीं हुआ था। 1948 में मैंने सबसे पहले छत्तीसगढ़ में खुमान एंड पार्टी आर्केस्ट्रा बनाया था। जो हिन्दी में होता था। मैं आर्केस्ट्रा में हारमोनियम व एकार्डियन बजाता था। 1948 से 1970 तक आर्केस्ट्रा चला। रिहर्सल के समय एक लडक़ी कमला राठौर को गाना गवा रहा था। मेरे रिहर्सल रूम में मेरा पता पूछते हुए देशमुख, हीरासिंह गौतम व नंद कुमार गौतम के माध्यम से चले आए। उन्होंने गौतम से कहा था कि ऐसा संगीतकार चाहिए जो छत्तीसगढ़ी संगीत में परंपरागत समझ रखता हो व छत्तीसगढ़ की कला व संस्कृति के लिए कुछ काम कर सकता हो। उन्होंने देशमुख से कहा था कि खुमानलाल साव है। वह संगीत का जानकार के साथ छत्तीसगढ़ी भी है वो अगर मदद कर दे तो सभी काम हो जाएगा। मैं उन्हें पिनकापार के दाऊ के रूप में जानता था वह वहां कि मालगुजार थे। उन्होंने मुझसे कहा कि -‘मै छत्तीसगढ़ की सेवा कला के माध्यम से करना चाहता हूं क्या आप मेरा साथ दोगे।’ मैंने जवाब दिया कि -‘स्कूल में मास्टर हूं अपनी ड्यूटी भी चाहूंगा, आपकी व छत्तीसगढ़ की सेवा भी चाहूंगा ये सब कला के माध्यम करने की बचपन से चाहत हैं।’ आज स्थिति उलट गई है कहीं से निकलो और दूसरी पार्टी बना लो। स्थिति यह भी हो गई है कि यहां के कलाकार अब बदचलन औरत को अपनी संगनी बनाकर पार्टी बना लेते हैं। 1943 में पढ़ाई छोडक़र घर बैठ गया था। डोगंरगढ़ में मटिया, गेंदाटोला में जंगलपुर व डोंगरगांव में खुर्सीटिकुल का मैं दाऊ कहलाता हूं। हां खुर्सीटिकुल मेरा गांव है। बाद में पूंजीपति लोग आए और मेरे गांवों को खरीद लिए।

मेरे पिताजी और मामा कलाप्रेमी थे। इस विधा से जुडऩे की एक घटना बताता चाहूंगा कि मंदराजी चिकारा बजाया करते थे। हमारी मां लोग दो बहिने थी। बड़ी मां का बड़ा लडक़ा मंदरा जी और छोटी मां का छोटा लडक़ा मैं। मंदरा जी 1927-28 में गांव वालों के साथ तबला बजाता था बाद में चिकारा बजाना शुरू किया कहीं इन लोगों ने हारमोनियम देखा, उन्होंने पता लगाया कि कलकत्ता में हारमोनियम मिलता है। फिर क्या था मेरा मामा मंदरा जी व पिताजी कलकत्ता चले गए। सभी आर्थिक रूप से संपन्न थे। जहां संपन्नता होती है वहां किसी न किसी तरह की लत भी आ जाती है रास्ते में हारमोनियम के साथ चरस भी खरीद लिया उसे हारमोनियम के अंदर रख लिया यात्रा के दौरान सेवन करते हुए किसी ने बता दिया कि इनके हारमोनियम में चरस है फिर क्या था रेलवे पुलिस ने उन लोगों को जमशेदपुर (टाटा) में रेलवे थाना में बिठा दिया। हमारे गांव के आदमी टाटा में कमाने खाने गए थे। पिताजी मंदराजी दाऊ दो अन्य व्यक्ति को रेलवे थाना में बिठाकर वहां निवासरत परऊ राम साहू के घर जमानत के लिए चले गए। उनके खिलाफ चालान हो गया था। सभी जमानत पर छूटे मजेदार बात यह रही कि इस जमानत में लगे 10 दिन में उन लोगों ने मेहनत कर हारमोनियम की प्रारंभिक शिक्षा किसी जानकार के माध्यम से हासिल कर ली।

घर पर मैं बड़ों की अनुपस्थिति में गलत-सलत हारमोनियम चुपके से बजाता रहता था। एक बार स्वामी मुक्तानंद का प्रवचन सुनने घर के लोग 9 दिन के लिए टाटेकसा चले गए मैं उन लोगों के साथ नहीं गया। मेरे देखरेख के लिए घरवालों ने नौकरों को बोल दिया। पहले ही दिन जब नौकर लोग सोने के लिए आए तो उन लोगों ने कहा कि तुम हारमोनियम बजाओ हम गाना गाएंगे। 4-5 चरवाहा नौकर बच्चे गीत गाते और मैं गलत-सलत हारमोनियम को बजाता। लेकिन उस समय उनका गीत का सूर ताल ठीक था मुझे ही बजाने नहीं आता था। इस दौरान इन 8 दिनों में मैं अच्छा बजाने वाला हो गया। मेरा प्रथम गुरू वहीं चरवाहा हैं यहीं से घर व रामायण में बजाने लगा। घर के पास झिटिया में मंडई में उस जमाने के बुजुर्ग व प्रसिद्ध कलाकार राजाराम साहू टाटेकसा (बाघनदी) के पास घुंघरू बांधता व साड़ी पहनकर सिर के ऊपर 7 लोटा रखकर घंटों नाचते रहता था बाद में लोटा उतार देता था। उस समय 80 साल के थे राजाराम। 70-75 उम्र वाले बुजुर्गों का बसंतपुर नाचा पार्टी की यह घटना 1914 का बता रहा हूं। झिटिया वाले सोचे चिकारा चलता था चिकारा नहीं बजाएंगे? अब हारमोनियम बजाएंगे। पार्टी वालों ने कहा कि हारमोनियम कौन बजाएगा? तो उनके लोगों ने कहा कि खुमान के मां को जाकर पांव पकड़ कर खुमान को बुला लाओ। वह समय खड़ा साज का था वाद्ययंत्रों को गले में टांगना पड़ता था। मेरे गांव का रिश्ता का मामा सुंदर लाल हल्बा ठाकुर था उसने कहा मैं हूं तेरा सेवा करूंगा तू बजाना। हारमोनियम के हत्था में गमछा बांधकर मेरे गले में टांग दिया उसे मामा ने उठाए रखा उन बुजुर्ग लोगों के साथ 13-14 साल का बच्चा रातभर हारमोनियम बजाता रहा यह मेरे जीवन का पहला सांस्कृतिक कार्यक्रम था।

पहला छत्तीसगढ़ी गीत गेंदाफूल गे… के इतिहास पर कुछ भी बताना बड़ा मुश्किल है। छत्तीसगढ़ी लोकगीत का कोई रचयिता नहीं था। यह परंपरा के अनुसार चला आ रहा है। गीत लिखने के लिए कवि दिमाग चाहिए, तो जितने पहले कवि हुए सब रायपुर क्षेत्र के हैं। उन्हीं में से रेवाराम बाबू रतनपुर, दूसरा जहां तक गेंदाफूल गे… के रचयिता मुकूटधर पांडेय। उनके कविता में छत्तीसगढ़ी शब्द मिलता है वह रायगढ़ का रहने वाला था। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी व गजानंद माधव मुक्तिबोध हिन्दी में लिखते थे वे कभी भी छत्तीसगढ़ी में नहीं लिखे। वास्तव में वो सब नौकरी करने आए थे वे सरस्वती प्रेस में थे। रिटायर होने के बाद आए थे। एक दिन दिवाकर को क्लास से निकाल दिया था। उनका परिवार पहले कॉलेज परिसर में रहते थे बाद में पठानपारा में किराए के मकान में रहने लगे थे। कालेज के पहले दुर्गा चौक के पास एक होटल था। उसी होटल मेें सारे प्रोफेसर चाय नाश्ता करते थे। सबका उधारी वो होटल वाला लिखता था। होटल वाला मुक्तिबोध के हालात पर तरस खाकर 100 रुपए के उधारी पर मात्र 75 रुपया लिखता था। जब तक मुक्तिबोध थे होटल मालिक उनको इस तरह छूट देते रहे थे।

ददरिया, करमा, सोहर, विवाह गीत के साथ सांस्कृतिक संस्था खोले हैं तो सारा कार्य संस्कृति से जुड़ा होना चाहिए उसे लोग देखे और उसे करना अनिवार्य था। चाहे देवार कर्मा हो या आदिवासी कर्मा हो इनमें हमारी संस्कृति की छाप नजर आती है। आज गावों में यह परंपरा जीवित है गोवर्धन पूजा के दिन 5-6 औरतें आती और सुआ गाकर चले जाती है। टोकना रखकर ताली पिट-पिटकर गा लेते हैं थोड़ा बहुत आरती भी उतारते हैं। हम इस तरह उसमें कुछ पैसा रख देते हैं ये हर साल होता है और रात को राऊत लोग गोवर्धन पूजा करते हैं। यह लोकरूप आज भी जीवित है। इस तरह हम चंदैनी गोंदा में सुआ, ददरिया, डंडा देवार कर्मा व देवार डेरा बना डाले थे। प्रसिद्ध नाटक ‘कारी’ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का लेख है यह मूल रूप में ‘आत्मा’ के नाम सेे हिन्दी में कालेज व हाइस्कूल में भी मंचन किया जाता था। उस पर कारी लिखा गया है। यदि हिन्दी की आत्मा कारी में नहीं होती तो पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी नहीं होते।इस आपाधापी के जिंदगी में संस्कृति से जुड़े व्यक्ति के जीवन में सुख का अर्थ संतुष्टि से है। मेरे जीवन में मेरा परिवार बहुत साथ देता है। मेरा घर मेरे पुत्रों व नाती-पोतों से भरापूरा है। वो मेरा रहन सहन देख रहे है। उनका कहना है कि ये जो भी कर रहे हैं करने दो। जितनी सेवा करना करो। इनकी शान में बाधा मत पहुंचाओ। इनके नाम से हमारा भी नाम हो सकता है। मेरे नाती बहुएं मेरे मंच के कलाकारों को खाना बनाकर खिलाते हैं। मेरे सांस्कृतिक कर्म की आलोचना होनी चाहिए लेकिन घटिया स्तर से आलोचना न हो सकारात्मक आलोचना हो। ईर्ष्या या जलन से वाहियात आलोचना नहीं होनी चाहिए।

नाचा को लेकर मेरा नजरिया अलग है आजकल लोगों का टेस्ट बिगड़ चुका है। एक लडक़ी अगर मंच पर नृत्य कर रही है तो लोगों को मजा नहीं आएगा। एक आएगा उसका हाथ पांव खींचेगा या फिर चुम्मा चाटी कर फुहड़ता का जाल बुनेगा तब लोगों को रास आएगा ऐसे कुसंस्कृति से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। मेेरे द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रमों को देखिए रातभर कार्यक्रम चलता है कोई युगल एक-दूसरे का हाथ तक नहीं पकड़ता है। ददरिया में क्या हाथ और अंगों को छू कर मंचों पर जाएंगे? आज गांव हो या शहर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गंदा गीत बजता है। मेरे पास नए गीतकारों व कवियों के रचनाएं पहुंचते है उसे पढ़ता हूं और रख देता हूं। नए रचनाओं में क्या देखूं यही कि लडक़ी का पैर, आंख, कमर, छाति इसके अलावा नए रचनाकारों को संसार में प्रकृति से कुछ भी नहीं मिलता और या तो रचनाकारों को प्रकृति का ज्ञान नहीं है या लिखने का हुन्नर नहीं आता। मेरे साथ राम कैलाश तिवारी थे जो बाद में सरकारी नौकरी में बीईओ (खंड शिक्षा अधिकारी) हो गए। देवार डेरा में हीरो का अभिनय किया करते थे अच्छा साहित्यकार भी हैं। एक दिन मेरे घर में आकर मुझसे कहने लगे कि एक गीत लिखा हूं। मैंने उनकी रचना को पढ़ा और उनसे कहा कि शिक्षित व्यक्ति हो मास्टरी का अनुभव भी है सरकारी नौकरी में अभी एडीआईएफ हो आपको उच्च स्तर के रचनाएं रचने चाहिए ये क्या लडक़ी की आंखें, छाती, भौ और पैर यही लिखना बाकी रह गया है। वर्तमान प्राकृतिक सौंदर्य के साथ समाज की दुख व सुख को जोडक़र लिखो। वास्तव में रचनाओं में यह बताने कि कोशिश होनी चाहिए कि समाज आखिरकार सोचता क्या है? आत्मा से जुड़े स्पंदन को गीतों में पिरोने की कोशिश होनी चाहिए। तब उसने गीत लिखा-‘चलो जागो रे भाई जुड़ मिल के सबो झन करबो निंदई…’ तो ऐसा गीत चाहिए। लोगों को यह समझ में आएगा कि हम धान निंदई करने की बात कर रहे हैं लेकिन उसके भावार्थ में जब पहुंचेंगे तो समझेंगे कि समाज के बुरे लोग की निंदई करने की चाहत गीत में निहित हैं।

देश के प्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर व भूपेन हजारिका आज फिल्मी दुनिया का नामी गिरामी गायिका व गायक में शुमार हैं फिल्म वाले जितना इन्हें ऊपर चढ़ा दिए लोक कृति के आधार पर धरातल पर उनका उतर पाना असंभव है। हजारिका वास्तव में असम के लोक संगीत के जाने माने शख्सियत हैं। जितना भी उन्होंने रचा है उनके हर गीत में आसाम की छाप साफ नजर आती है। मैं समझता हूं कि छत्तीसगढ़ी कला और संस्कृति में छत्तीसगढ़ी आत्मा की छाप दिखनी चाहिए। चंदैनी गोंदा, सोहना बिहान जैसे मंचों के साथ अन्य छोटे-छोटे ग्रामीण मंचों में छत्तीसगढ़ी संस्कृति की झलक हमें शुद्धता के साथ साफ नजर आती है। उसके मुकाबले कुकुरमुत्तों की तरह उग आए फुहड़छाप ग्रामीण व्यवसायिक मंचों की तुलना मुर्खता होगी। चंदैनी गोंदा की महक छत्तीसगढ़ के साथ पूरे देश में फैल गई है। व्यवसायिक स्तर पर भी उसकी अपनी अलग पहचान है।

लोक संस्कृति व कला की शुद्धता जैसे गंभीर सवाल पर बोलना चाहूंगा कि साफ है कि हमारे संस्कृति का एक हिस्सा कला ही तो है। यदि कला में विकृति आएगी तो निश्चित तौर पर लोक संस्कृति में भी विकृति आएगी। वर्तमान धुंधलके काले दिनों में सिर्फ आदिवासी संस्कृति पर ही नहीं बल्कि तमाम राज्यों में स्थित समुदायों व भाषा-भाषियों के संस्कृति में पतन हो रहा है। बंगाल हो या बिहार चहुं ओर पतन ही पतन दिख रहा है इसके लिए मैं किसी शक्तिशाली राज्य को दोषी नहीं ठहराता इसके लिए मूल रूप से कलाकार ही जिम्मेदार हैं। विचित्र तरह की संस्कृति का प्रदर्शन कर हम कलाकार ही संस्कृति में धब्बा लगा रहे हैं। ऐसे बीमार संस्कृति से पीड़ित होने के बाद सरकार के पास जाकर कहते हैं हम कलाकार हैं मुआवजा दो।मैं कलाकारों से कहना चाहूंगा कि वे इस विधा के लिए अब तक कला को विविधता प्रदान करने में क्या-कुछ किए हैं? ओ ये भी मेरे पास आकर बताए कि उनकी वास्तव में उपलब्धि क्या है? आपने दुर्घटना के बाद निजी अस्पताल में भर्ती कलाकार (संगीता मानिकपुरी) के संबंध में कहते हैं कि उनके साथ एक व्यक्ति के हैसियत से सहानुभूति मेरी है लेकिन ईमानदारी से मुझसे पूछेंगे तो वो कैसी कलाकार है उसके पास क्या हुन्नर है मैं नहीं जानता? मैंने सुना भी नहीं है? कोरबा में एक महिला कलाकार बीमारी और मौत से जूझ रही है। संस्कृति विभाग में एक मुलाकात के दौरान रमा जोशी ने उनके संबंध में मुझे बताई। ऐसे स्थितियों में मेरा सरकार को एक सुझाव है कि वह कलाकारों के लिए अलग से एक विभाग का गठन करें और अंचल के प्रतिभावान कलाकारों को खोज परख कर प्रोत्साहित करें।

समय के बदलाव के साथ लोककलाओं में सहज परिवर्तन होते हैं। किंतु मेरी लंबी कला जीवन का कड़वा अनुभव है कि कलाकार पैसे कमाने के लिए व्यवसायिक दृष्टि लिए बैठे है। छत्तीसगढ़ की सेवा वह भी लोक संस्कृति के माध्यम से सिर्फ मंच पर बोलने के लिए रह गया है, दिल में कुछ रहता नहीं है। ऐतिहासिक चंदैनी गोंदा का निर्माण 7 नवंबर 1971 को हुआ था तब मैं साधारण सा संगीत निर्देशक था आज चंदैनी गोंदा के विरासत को लेकर चले आ रहा हूं। उस मंच में छत्तीसगढ़ की माटी की खूशबू व मेहनत व रीति रिवाजों की अद्भूत मिश्रण आज भी हमारी सांस्कृतिक मंच में देखने को आपको मिलेगा। वहां रामचंद्र देशमुख ने एक विचित्र पोस्टर मंच पर दर्शकों के लिए टांग रखा था। जिसमें लिखा हुआ था कि बजुर्गों से आशीर्वाद, युवक-युवतियों से अनुशासन, बच्चों से दया मया ये तीन टिकट जिन दर्शकों के पास हो वो चंदैनी गोंदा देखने आए वरन घूमते रहे। एक अप्रतिम मंच जो उनके खलिहान में बना हुआ था। रात भर खलिहान में बने मंच से कार्यक्रम का लुत्फ उठाया करते थे। आज भी हम उस परंपरा का निर्वहन करते हैं कार्यक्रम के लिए पहुंचे कलाकार सबेरे से ही कार्यक्रम देने के पहुंचते हैं। सभी प्यार से हमारे घर दाल, भात, रोटी व सब्जी इसके अलावा जो कुछ भी उपलब्ध हो सब खा-पीकर कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं इसे घर में मौजूद सारे सदस्य मिल जुलकर पूरा करते हैं रामचंद्र देशमुख संगीत का जानकार नहीं थे बल्कि सही मायने में कहा जाए तो कला संयोजक थे। चंदैनी गोंदा का पहला प्रदर्शन रामचंद्र के गांव बघेरा में दूसरा प्रदर्शन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी महोत्सव म्युनिसिपल स्कूल राजनांदगांव के मंच पर हुआ था।

दूर-दूर से पहुंचने वालों में कला के पारखी राजनांदगांव के साहित्यकार बघेरा गए थे उन लोगों ने सोचा कि यह साहित्यिक कार्यक्रम है इसे राजनांदगांव में कराया जाए। तीसरा कार्यक्रम पैरी में था दुर्ग से बालोद रोड पर। चंदैनी गोंदा का तीसरा कार्यक्रम पैरी में था। सिकोसा के पास। हीरालाल शास्त्री के यज्ञ के आयोजन में हुआ था। महा सिंह चंद्राकर को संगीत नहीं आता था। गाना, बजाना नहीं आता था। मेरा अच्छा दोस्त। उस समय लडक़ी 72-73 में सातवीं पढ़ती थी। गाना गाती थी। मुझे रखने कहा एक दिन तुम बघेरा लेकर आओ। रिहर्सल रूम में बैठा था। वहां आई। मैं बोला चलो गाओ। उस समय उतना चंदैनी गोंदा के गीत फेमस नहीं हुआ था। फिल्मी गाना सुनाई क्या है कि उम्र के हिसाब से आवाज में परिवर्तन होता है गाई तो मुझे मजा नहीं आया। घर की बेटी है। रामचंद्र फाटक के आड़ में खड़ा था। थोड़ा ईशारा किया। उसको महा सिंह चंद्राकर देखा आग बबूला हो गया। साला हराम खोर मुझसे बड़ा हो गया। मेरी बेटी को ऐसा वैसा कहता है। चलो ममता घर चलेंगे। रामचंद्र ने ऐसा किया तो उसे उठा कर ले आया। उसके बाद एक दो साल के अंदर उसके समकक्ष पार्टी बनाऊंगा। सम्पन्नता में महा सिंह चंद्राकर इनसे ज्यादा थे, मतवारी में 300 एकड़ जमीन, उनका जमीन पिनकापार व खामतराई 3-4 सौ जमीन हैं। कुर्मी जात के लोग लड़ाकू होते हैं। दोनों कुर्मियों ने नहीं पटी। उसने भी अच्छे अच्छे लेखक, साहित्यकार लेखक कवियों को इकट्ठा किया। आत्माराम वर्मा जिसने विवेकानंद आश्रम बनाया वो मेरा भाई केपी साव जो म्युनिसिपल हाईस्कूल प्रिंसपल थे व देवेन्द्र वर्मा जो संस्कृत कालेज में प्रोफेसर थे मिलकर एक कहानी लिखी थी जिसका नाम ‘सुबह का तारा’ था इसे मुकुंद कौशल और दो-चार और साहित्यकारों ने मिलकर नाटक के रूप में लिखा ‘सोनहा बिहान’ के इसी नाम से मंच का नाम पड़ गया। जैसी कहानी चंदैनी गोंदा में दिखती थी वैसी कहानी सोनहा बिहान में दिखती थी। ओ समस्या को खड़ा करता था ये हल करता था। पहला कार्यक्रम ऐटेबंद में देखा महा सिंह को बोला अच्छा है लेकिन क्लाईमेक्स खतरनाक हैं। संस्था को छत्तीसगढ़ के लोग जिनको मंच में मार पीट रहे हो उसके समर्थक लोग तुम्हारे खिलाफ खड़े हो जाएंगे शोषक एक व्यापारी था और शोषित गांव के लोग थे। उसे गांव के लोग मारते हैं। अरे भाई शोषण हो रहा है बतला दो न! जिनको मारपीट रहे हो उसे बताओ। तब उस पार्ट को उसने काटा। उनका भी मदद किया था।

शास्त्री और लोककला के मध्य जहां तक रेखा खींचने की सवाल है लोक से शास्त्र बनता है। शास्त्र से फिर लोक का रूप धारण करता है। आज छत्तीसगढ़ी फिल्म की बाढ़ सी आई है पर फिल्म उद्योग ने छत्तीसगढ़ी जिंदगी को कुछ भी नहीं दे पाया है हमारे संस्कृति के लिए इस विधा का अब तक कोई मूल्य नहीं है। मैं संतोष जैन का ‘मां बम्लेश्वरी मैया’ लिख दिया। बढिय़ा बढिय़ा धुन बनाया। लोग आज भी सुनते हैं तो खुश हो जाते हैं। गीत मुकुंद कौशल ने लिखा मैंने संगीत दिया। मुम्बई से सुदेश भोसले व भिलाई की पामिला जैन ने इस फिल्म में गीतों को माधुर्यता के साथ सजाया है और बहुत सारे लोगों को गवाया। हबीब तनवीर का जहां तक सवाल है उसेे मीडिया ने चढ़ा दिया था इसमें कोई दो मत नहीं की अच्छा डायरेक्टर था। जितना मीडिया वालों ने चढ़ाया ओ उतना नहीं थे वह शोषण करके ही आगे बढ़ा है। उसने यहां के कलाकार को उनकी कृतियों को परोसा और अपना नाम लेता गया। ‘मोर नांव दामाद मोर गांव के नांव ससुराल’ ये हमारे यहां बसंतपुर वाले ‘डोकरा लोग’ करते थे बुढ़वा बिहाव जिसमें मदन निषाद व ठाकुर राम लोग अभिनय करते थे उसे नया नाम देकर परोस दिया, वाहवाही लूट ली दूसरी चीज ‘पोंगवा पंडित’ जिसे हम सभी मेहतरानी गम्मत के नाम से जानते हैं उसमें एक पंडित होता था उसमें उन्होंने कुछ फेरबदल कर मेहतरानी शीर्षक को हटा दिया और ‘पोंगा पंडित’ लिख दिया। विजयदान देथा की कहानी ‘फितरती चोर’ पर आधारित ‘चरणदास चोर’ दिसम्बर 1974 में सबसे पहले 18 हजार दर्शकों के सामने भिलाई में प्रस्तुत किया गया था। बहुत पहले की बात है पता नहीं वो क्या क्या किया दिल्ली में। एक करूणा व ममत्व से सराबोर बहादुर कलारीन इसमें भी वे हमारे गांव की कहानी बोलते थे।

मुझे विदेशों में जाने का मौका मिला लेकिन बोल दिया कि जाऊंगा नहीं हमारे 45 कलाकारों में से 13 कलाकारों को लेकर विदेश जाना कभी भी संभव नहीं हो सका। मैंने इस सवाल पर कहा भी कि यदि विदेश भेजना ही होगा तो कम से कम मेरी टीम बनेगी 25-26 कलाकारों की जिसे भेज सकेंगे तो बोलिए? इस कड़ी में विनोद कुमार शुक्ल व शंभू मित्र को तो जानता नहीं लेकिन बीवी कारंत बढिय़ा कला व्यवस्थापक व निर्देशक थे कारंत ने एक नाटक किया था ‘इंसाफ का अंधेरा’ जिसका मंचन राजनांदगांव में विभा मिश्रा के साथ किया गया था यह तीन घंटे का नाटक था। हम लोग सदर लाइन में जैन मंदिर (जो अब तेरापंथी) परिसर में नाटक देखने बैठे। नाटक कब शुरू हुआ और कब खत्म हुआ हम नहीं जानते। अंत तक कोई उठने का नाम नहीं ले रहा था ऐसा उनका नाटक था। नाटक मोनोटोनस नहीं लगते हैं जमाकर फंसाकर कर रखा था। संवाद व घटनाएं दर्शकों को चुबंकीय रूप से बांधे रखा।भैयालाल हेड़ाऊ हमारे यहां स्टेट हाईस्कूल में पढ़ा है जिस समय पढ़ रहा था। पहली बार उसको मैंने देखा वहां संगीत देने गया था। वार्षिक उत्सव में तो वो लडक़ा अब बुजुर्ग हो गया है एक ऑफिस था उस ऑफिस के सामने कुर्सी लगाकर व पगड़ी बांध कर भैया लाल बैठा था। भैयालाल के साथ कृष्ण कुमार श्रीवास्तव नाटक कर रहे थे। देशभर में खेलें। नाटक का नाम याद नहीं आ रहा है। उसमें भैयालाल चपरासी बना था। कृष्ण कुमार पात्र भी मौजूद था तम्बाकू मलते गाना गा रहा था। न….न…. रे न रे। ‘नदिया के पार’ जिसमें किशोर कुमार कामिनी कौशल, दिलीप कुमार ने काम किया। धीरे…धीरे नाव चला रे …उसके बाद खुमान एंड पार्टी का नाम शारदा संगीत समिति रख दिया गया। खुमान एंड पार्टी अच्छा नहीं लग रहा था। तब तक सभी सक्षम हो गए थे। शारदा यानी सरस्वती। अनुप्रास अलंकार सोच कर रखे। रिहर्सल रूम में भैयालाल आया। आया तो गिरिजा कुमार सिन्हा ने कहा कि गवा कर देखो। हेमंत कुमार के आवाज में काशी देखी मथुरा देखी देखी न…….। सूरज रे ढलते रहना……। मैंने कहा पार्टी में रख लो। वास्तव में भैयालाल हेड़ाऊ, हेमंत कुमार को हूबहू गाने वाला व्यक्तित्व है। उन्होंने चंदैनी गोंदा में हेमंत को छोड़ अपने नैसर्गिक आवाज में भी गीत को गाया था।

अधिवक्ता कनक तिवारी का जिक्र करूंगा बहुत जोरदार साहित्यकार हैं। जब चंदैनी गोंदा निर्माण हो रहा था उस समय दुर्ग में रहते थे चंदैनी गोंदा के रिहर्सल को 50 बार देखा है यहां राजनांदगांव में हनुमान मंदिर के पास उनका घर है। ‘अभिमन्यु’ में कनक ने काम किया था 1970 के पहले की बात है। वह हाईस्कूल पढ़ रहा था उसको भारी डॉयलाग दिए थे। राजांदगांव का रहने वाला है। मंजुला दास गुप्ता आई थी। उसकी लडक़ी अच्छी गाती है। जैसा मैं चाहता था वैसा नहीं गा पाई। कविता प्रायमरी से मेरे साथ है। पली बढ़ी सब कुछ यहीं का है। छत्तीसगढ़ी गीतों में ममता का आवाज ज्यादा उपयुक्त है। कविता के गीतों में फिल्मी गानों की झलक है। पहले वह फिल्मी गीत ही गाया करती थी गोंदिया में पैदा हुई और सुमधुर छत्तीसगढ़ी गीतों की अभ्यस्त हो गई। उनका पिताजी बैंक में चपरासी थे। दुर्ग व राजनांदगांव से ज्यादा छत्तीसगढिय़ां हमारे साथ थे। उनकी दो मां थी दूसरी मां के बच्चे नहीं थे पहली मां के ये बड़ी व छोटी बहनें थी। छोटी बहन ठाकुर टोला में टीचर थी जिसका दुर्घटना के कारण देहांत हो गया। कविता में आवाज अच्छी है। आवाज सभी का फटता है ज्यादा खींचने की कोशिश करोगे तो फटेगा ही। हेड़ऊ बहुत अच्छा कलाकार थे। चंदैनी गोंदा में अभिनव के साथ अपने निराले आवाज में गीत गाने के लिए मशहूर थे। उन्होंने कई प्रसिद्ध गीत संतोष झांझी के साथ गाया है। उनका एक गाना काफी चर्चित रहा है-‘छनर छनर पैरी बाजे खनर खनर चूढ़ी-2, हासत फुलकत मटकत रेंगे बेल बेली टुरी…। काठ-काठ के धान मड़ावे ओरी ओरी करपा देखत में बड़ी नीक लागे सुन्दर चरपा पे चरपा, लकड़ लकड़ ..। यह जाने माने कवि कोदो राम दलित का लिखा हुआ गीत है।

अच्छी गीत रचने के लिए हमेशा ध्यान रखें कि उसमें मात्राएं पूर्ण होनी चाहिए, तुकबंदी होनी चाहिए और गाने के बोल स्वच्छ होने चाहिए। इस तरह आपके गीत अच्छी हो सकती है। मैं अपने विकल्प के रूप में किसी को नहीं देखता हां मेरे संगीत का कॉपी सभी कर रहे हैं। वर्तमान में उभरते गायक-गायिकाओं के संबंध में बता पाना मुश्किल काम है ऐसा है थोड़ा बजाना आ गया थोड़ा चमचागिरी करना आ गया तो लोग कहने लगते हैं कि ये चंदैनी गोंदा से आगे ले जाएगा। वास्तव में अच्छा बजाने वाला अच्छा चमाचागिरी करने वाले किसी सांस्कृतिक मंचों को आगे नहीं ले जाता बल्कि जिसका सोच उत्तम हो, छत्तीसगढ़ के प्रति जो सोचता है और जिसमें व्यवहार में जाने की माहरत हो वही व्यक्ति मेरा विकल्प हो सकता है।अब तक सभी कार्यक्रम व गीत खुद के लिए गाया। 100 कार्यक्रम दिए जिसमें संगीत रामचंद्र देशमुख ने दिया और बताना चाहूंगा कि 1979-80 से चला आ रहा हूं। अभी तक लगभग ढाई हजार से ज्यादा कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी है। जहां तक संगीत की बात है उसकी संख्या 700 से 800 तक होगी। इसमें सभी गाना गाता हूं तभी कलाकार लोगों को सिखाता हूं। मंच में नहीं गाया। ‘मोर संग चलो रे…’ इसे लक्ष्मण मस्तुरिया ने गाया है। चंदैनी गोंदा में एक दृश्य था। जिसमें मंच में एक हिन्दुस्तान का नक्शा टंगा हुआ था और हर प्रांत का नक्शा भी उसमें अंकित था छत्तीसगढ़, पंजाब, बंगाल, बिहार व उड़ीसा सहित पूरे हिन्दुस्तान का नक्शा उसमें अंकित किया गया था, तो एक हीरो शोषित जिसे अभिनय में दुखित हीरो कहते हैं वो अपना लाठी साथ में रखा रहता हैं हर प्रांत को चिन्हित करते रहता है उन राज्यों को छूते रहता है।

कथानक में एक शिव नाम का लडक़ा आता है। शिव यानि आस्था। वह जब आता है आस्था का प्रतीक कहलाता है। दुखित जो है शोषण-शोषित का प्रतीक है। वो आकर पूछता है दुखित को-‘बबा इस नक्शा में तुम क्या देख रहे हो, -‘तो बोलता है इस नक्शा में छत्तीसगढ़ को ढूंढ रहा हूं।’ उस समय छत्तीसगढ़ अलग से नहीं था यह क्षेत्र मध्यप्रदेश राज्य में स्थित था। वो छत्तीसगढ़ जहां सुंदर लाल शर्मा जैसे साहित्यकार हुए। जहां मुकुटधर पांडेय जैसे जीव हुए लोगों को गिनाया उस छत्तीसगढ़ को मैं खोज रहा हूं, तो तुमको छत्तीसगढ़ नहीं दिखता। जवाब में आस्थावाला शिव कहता है-‘मुझे छत्तीसगढ़ दिखता है सभी जगह दिखता है। क्या पंजाब, क्या गुजरात क्या बंगाल जहां जहां शोषित है वहां वहां छत्तीसगढ़ दिखाई देता है पूरे हिन्दुस्तान में, तो अब क्या करे? ये शिव बोलता है मेरे संग चलो मै परिवर्तन करूंगा और छत्तीसगढ़ का गुनगान करते हुए लक्ष्मण मस्तुरिया इस गीत को गाते हैं।वर्ण व्यवस्था, जातिभेद, टोनहीप्रथा से ऊपर मेरे दिमाग में केवल छत्तीसगढ़ ही दिखता है। मैं जब देखता हूं तो गुजराती हो या बंगाली सभी में छत्तीसगढ़ी ही देखता हूं। मैं अपने आप को भी देखता हूं तो छत्तीसगढ़ी ही देखता हूं। और यही देखते देखते संगीत पर कुछ कार्य करते हुए इस संसार से विदा ले लूंगा। भविष्य के सवालों में क्या बताऊं थक सा गया हूं। आज भी अपने कार्य में तल्लीन रहता हूं लेकिन मुझको सामने कुछ दिखता नहीं क्योंकि 87 साल का हूं आगे क्या देखता हूं कल्पना कीजिए वहीं मैं देखता हूं कि और आगे क्या करना बाकी है?

वर्तमान में चल रहे असष्णिुता के हालातों में मैंने पुरस्कार लौटाया नहीं हूं। इस 87 साल के उमर को सरकार पद्मश्री देने के लिए भी सोचा भी तो क्यों? जबकि संगीत के कला में मैंने छत्तीसगढ़ को बदल कर रख दिया है। ऐसा काम मंत्री व नेताओं ने नहीं किया। आज मैं उन्हें मंदरा जी या राष्ट्रपति पुरस्कार देने के लिए दिख रहा हूं। आज की सरकार 25, 30, 35 वर्ष के युवाओं को पुरस्कार दे रही है जिसने इस क्षेत्र के लिए कुछ भी नहीं किया। अनुज शर्मा को उसके द्वारा दो फिल्मों में काम करने के बाद पद्मश्री दे दिया तथा मोनासेन को पद्मश्री से नवाजा गया। उसके बाद मुझे पद्मश्री देने आ रहे हो यानी कि मुझे जूता मारने आ रहे हो। 50 साले पहले मुझे पद्मश्री दे देना था। क्या है कि दे दो इसे जिंदा है मर भी नहीं रहा है। लोग पुरस्कार क्यों लौटा रहे वह मैं नहीं जानता तो बताऊंगा क्या? आप लोग जानते हो क्या? मैं राजनीति में भी बिल्कुल नहीं हूं? जो कुछ घट रहा है चाहे कांग्रेस हो या भाजपा जो सत्ता में आएंगे सभी यही करेंगे जो रमन कर रहा है। विकास एक प्रक्रिया है विकास अपने आप होता रहता है ये नेता लोग सभी होने वाले कार्यों को अपना कार्य बताकर वाहवाही लूटना चाहते कि इसका विकास हमने किया हैं। मैं जब राजनांदगांव के खुसीटिकुल में पढ़ता था तो देखा करता था कि अंग्रेजी सरकार बड़ी मेहनत कर 1943-44 के आस पास हमारे क्षेत्र में गिट्टी की सडक़ डोंगरगढ़ तक बनाया था बाकी पूरे मोहला-मानपुर में मिट्टी के सडक़ थे। हम जब आते थे तो पैदल इन सडक़ों में चलने में तकलीफ होती थी। जुलाई के बारिश वाले मौसम में बैलगाड़ी के पहिए कीचड़ में धंसते-डूबते आगे बढ़ता था।

जब आजादी के बाद कांग्रेस का राज आया तब तुरंत तो कुछ नहीं कर पाए। लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सत्ता में आते ही उस समय भी हम सभी विकास ही कर रहे थे। हमारे यहां राजनांदगांव से रायपुर गिट्टी का सडक़ था। डामर सडक़ 1955 के बाद भिलाई में जाकर देखा। वहां जाकर हम डामर वाले सडक़ों में बैठ जाते थे। 1960-70 के आसपास ही यहां डामर के सडक़ बने यानी देश के स्वतंत्र होने के 20 साल बाद विकास की आवाज उठने लगी। बताना यह चाह रहा हूं कि 13-14 साल के बाद यह बनना शुरू हो गया कैसा भी हो गिट्टी हो या और कुछ सडक़ तो बनाए गए थे। विकास एक प्रक्रिया है अपने आप ही होता है जहां नेता के कारिंदे नहीं घूसते वहां विकास होता ही है। कांग्रेसी नेता उदय मुदलियार मेरा पढ़ाया हुआ लडक़ा था। मेरे घर आकर बैठा करता था। एक बार उसने मेरे घर पहुंच कर कहा कि -‘क्या सर ये जीई रोड से आपके घर तक पहुंच मार्ग बहुत ही रद्दी है, आप लोग कुछ करते नहीं’ मैं जवाब में कहा था कि -‘देख उदय तमाशाबाजी मत कर, तुझे नहीं दिखता तू तो विधायक है।’ उसने मेहरबानी कर गिट्टी का सडक़ बनाने मेरे हाथ से कुदाल चलवाकर भूमिपूजन करवाया। संक्षेप में यही कि मट्टी का न सही गिट्टी से सडक़ तो बन ही गया। विकास के बिना आदमी जिंदा नहीं रह सकता। बहुत अच्छे कार्यों के बदौलत आप सामने आ जाएंगे, हमने अपने आंखों से देखा। किशोरी लाल शुक्ल बीएनसी मिल में काम करता था। उसके पास खुद का कार नहीं था। बीएनसी मिल के एम्बेसडर कार में घूमता था। तब वे नेता लोग भाषण मारते थे। जगह-जगह सभा करते थे ये किशोरी शुक्ल अपने गाड़ी में गुंडे रख कर विरोधियों पर अंडे फेंकवाता था। लोगों के नेताओं के रूप में समाजवादी मदन तिवारी, प्रकाश राय को जानता हूं जो मार भी खाते थे और जेल भी जाते थे। एक और कम्युनिस्ट ……रूईकर था।

नक्सलवाद समस्या को जो लोग जन्म दिया वही लोग जानेंगे। हम सांस्कृतिक संस्था वाले हैं छत्तीसगढ़ की संस्कृति पर कार्यक्रम देते हुए सभी जगह घूमते हैं। श्याम साय राजा पानाबरस वाले को भी जानता था। राजनांदगांव के दत्ता बुक स्टाल में मैं मोतीलाल वोरा, गणेश शर्मा, जीपीएस फ्रांसीस वहां बैठते थे और विविध चर्चाओं में मस्ते रहते थे मोतीलाल वोरा शुरूआत में बस के टिकट काटते थे। इसी दौरान कभी-कभी किसी कार्य से पहुंचने वाले श्याम साय से घर में मुलाकात हो जाती थी। एक और चर्चित व्यक्ति देव प्रसाद आर्य जो पानाबरस के थे उनसे भी मुलाकात होती थी। 87 वर्ष में सरकार मुझे पद्मश्री देना चाह रही है तो उसने बहुत देर कर दी वैसे भी सरकारी पुरस्कारों का कोई वजन नहीं होता। छत्तीसगढ़ के जनता ने जो पुरस्कार प्रशंसा व आलोचना के रूप में मुझे दिया है वह काफी है। राज्य निर्माण के 15 वर्षों में कोई बदलाव नहीं आया। भ्रष्टाचार और तेज गति से बढ़ गया है कहां-कहां ‘माल’ मिल सकता है इसकी खोज हो रही है। लोक कलाकार स्वाभिमानपूर्वक से जी सकें इसके लिए कुछ नहीं किया गया। पेंशन की अर्जी लेकर लोक कलाकार कई चक्कर लगाते हुए धक्के खाते नजर आते हैं।

और भी बहुत कुछ…
हां चंदैनी गोंदा दुबारा हुआ विसर्जित…

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