व्यक्ति विशेष

एक विधायक ऐसा भी था : सचिन झा शेखर

सचिन झा शेखर ● धनबाद को देश की कोयला राजधानी कहा जाता है। कोयले से कमाई भी हीरे की तरह होती है। धनबाद झारखण्ड का आर्थिक राजधानी की तरह भी है। धनबाद में कोयले के अलावा भी खाद , सीमेंट के कारख़ाने थे और भी कई उद्योग धंधे है। खूब पैसा है धनबाद में।

आज से 20 वर्ष पूर्व भी धनबाद के सड़कों पर देशी और विदेशी कार सरपट दौड़ते थे। बिहार के अंतर्गत आता था तात्कालीन धनबाद। जिसके नेताओं पर 600 करोड़ रूपये तक के घोटालें के आरोप लग चुके थे। धनबाद में भी राजनेताओं के गाड़ी बंगले देख कर साहित्यकार प्रभाष जोशी भी दंग रह गए थे ।

ऐसे में एक 3 बार का विधायक जिसके मजदूर यूनियन में लगभग 1 लाख मजदूर हो जिसे बिहार विधानसभा में शोषित वंचितों का आवाज़ माना जाता हो। वो जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर। अपने क्षेत्र की और पार्टी कार्यकर्ता के बाइक पर बैठकर दिन के 3 बजे निकल पड़ता है।

14 अप्रैल आते -आते धनबाद में धूप काफी तीव्र हो जाती है। जीटी रोड पर धुप का सामना करते हुए चलना काफ़ी कठिन हो जाता है। लेकिन उस विधायक के पास ना अपना गाड़ी था ना बंगला था।

14 अप्रैल 2000 को गोविंदपुर के जीटी रोड पर दिन के 3 बजे गुरुदास चटर्जी की हत्या कर दी गई। गुरुदास LPG (Liberalization, Privatization, Globalization) के बाद मजदूर वर्ग पर पड़ रहे प्रभाव विषय पर आयोजित एक बैठक में हिस्सा लेकर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर अपने विधानसभा क्षेत्र में अपने एक पार्टी कार्यकर्ता की बाइक पर बैठ कर वापस जा रहे थे।

उनका दोष यह था कि वो आदिवासी को न्याय दिलाने के लिए एक माफ़िया से उलझ गए थे, और मामले को विधानसभा में उठाकर उस आदिवासी को हक़ दिलवा रहे थे। गुरुदास के आवाज को गोलियों से खामोश करने का प्रयास किया गया।

गुरुदास चटर्जी एक अक्रामक वामपंथी नेता माने जाते थे। न सिर्फ विधानसभा बल्कि सदन के बाहर भी वो जनमुद्दों को लेकर उलझ जाते थे। उनके एक पुराने सहयोगी बताते है कि झरिया में एक बार मजदूरों के घर में 3 दिनों तक बिजली नहीं थी। विधायक गुरूदास को खबर पहुंची उन्होंने BCCL के अधिकारियों से कहा कल तक अगर बिजली नहीं आयी तो आपलोगों की भी बिजली काट देंगे। बात करने बाद में आएंगे।

गुरूदास समझौतावादी नहीं थे। गुरूदास की हत्या के बाद AK रॉय ने हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा था। गुरूदास और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के शंकर गुहा नियोगी एक ही तरह के क्रांतिकारी थे। दोनों विचारधारा से परिपूर्ण थे। दोनों ने ही अपने जीते जी एक ऐसे जन आधार को तैयार कर दिया कि उनके हत्या के बाद भी उनके संघर्ष कमजोर नहीं हुए।

गुरूदास की हत्या के 20 वर्ष बाद कोयलांचल में मजदूर राजनीति लगभग दम तोड़ चुकी है। स्वर्गीय AK रॉय के किताबों को हाल के दिनों में पढ़ने का अवसर मिला है। AK रॉय के मार्गदर्शन में गुरुदास जैसे युवा नेताओ ने भारत में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। जानकर हैरानी होती है कि पिछड़े हुए क्षेत्र में उनलोगों ने किस तरह से लोगों के बीच एक साम्यवादी समाज का निर्माण किया था।

आज झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने NDTV के साथ बात करते हुए कहा कि झारखंड के 8 लाख मजदूर बाहर के राज्यों में काम करते हैं। AK रॉय ने 80 के दशक में ही कहा था कि भारत सरकार झारखंड को आंतरिक उपनिवेश के रूप में देखती है। सरकार ने झारखंड के औद्योगिक शहरों में कॉलोनी का निर्माण करवाया है जरूरत है साम्यवादी समाज की रचना की। लेकिन सरकार 2 तरह की समाज की रचना कर रही है। अगर झारखंड का जो सपना उस दौर में उन नेताओं ने देखा था। अगर पिछले 20 वर्ष में उस पर अमल होता तो आज मुख्यमंत्री को निर्लज्जता पूर्वक यह बात कहने की नौबत नहीं आती।

कोरोना संकट के बाद एक बार फिर साम्यवादी आंदोलन ही मुक्ति का रास्ता दिखा सकता है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से विफल रही है, आने वाले दौर में शोषण का दौर बढ़ेगा जिससे निजात के लिए आर्थिक व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई ही एकमात्र रास्ता है। आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन ही अब सामाजिक परिवर्तन का वाहक बनेगा।

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